घर की चारदीवारी में सुई-धागे तक सिमटा हुनर आज बिहार की हजारों महिलाओं की आर्थिक आजादी का सहारा है। कोई जूट के थैले सिलकर हर महीने हजारों कमा रही है, तो कोई सैकड़ों बेटियों को सिलाई सिखा रही है। विभिन्न विभागों के साथ मिलकर जीविका दीदियां 149.7 करोड़ रुपये का शुद्ध व्यवसाय कर चुकी हैं और 68,77,557 परिधान तैयार कर चुकी हैं।
बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन समिति जीविका यानी बिहार ग्रामीण आजीविका परियोजना का संचालन कर रही है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण गरीब महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों के जरिए संगठित कर आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाना है। इसी कड़ी में सिलाई का काम ग्रामीण महिलाओं के लिए आय का प्रभावी जरिया बनकर उभरा है। संगठित रूप से सिलाई करने से महिलाओं को रोजगार ही नहीं मिला, उनमें व्यावसायिक समझ, वित्तीय साक्षरता और नेतृत्व क्षमता भी विकसित हुई है।
जूट के थैलों से बनी पहचान
नालंदा जिले के नूरसराय प्रखंड की नीतू देवी जीविका से जुड़ने के बाद स्वयं सहायता समूह की बैठकों में शामिल होने लगीं। इसी दौरान उन्हें नूरसराय के ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान में जूट उत्पाद निर्माण प्रशिक्षण की जानकारी मिली। उन्होंने 4 से 16 दिसंबर 2024 तक प्रशिक्षण लिया और अपने हुनर को रोजगार में बदलने का फैसला किया। मशीन खरीदने के लिए उन्होंने स्वयं सहायता समूह से 75,000 रुपये का कर्ज लिया और जूट के थैले व अन्य सिलाई उत्पाद बनाकर अपना व्यवसाय शुरू किया। नीतू देवी बताती हैं, 'शुरुआत छोटे ऑर्डर से हुई, लेकिन बेहतर गुणवत्ता ने हमारे उत्पादों को बाजार में पहचान दिलाई। जीविका के विभिन्न आयोजनों में स्टॉल लगाने का अवसर मिला। यहां उत्पादों को सराहना मिली और सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थानों से भी ऑर्डर मिलने लगे।' आज वह जूट उत्पादों के व्यवसाय से 30,000 से 40,000 रुपये हर माह कमा रही हैं।
सिलाई, दुकान और सैकड़ों शिष्याएं
जमुई जिले के चकाई प्रखंड की मीरा देवी ने जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद सिलाई प्रशिक्षक के रूप में करीब 200 महिलाओं और युवतियों को प्रशिक्षण दिया है। वर्ष 2014 से वह जीविका मित्र की जिम्मेदारी भी निभा रही हैं। मीरा देवी बताती हैं, 'सिलाई के साथ मैं मनिहारी दुकान से भी कमाई कर रही हूं। जीविका स्वयं सहायता समूह से 50,000 रुपये का कर्ज लेकर दुकान शुरू की। जरूरत बढ़ने पर दोबारा 50,000 रुपये का कर्ज लेकर व्यवसाय आगे बढ़ाया। इसके अलावा, मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना से मिली 10,000 रुपये की सहायता राशि का उपयोग भी दुकान के विस्तार में किया।' सिलाई, मनिहारी दुकान और कृषि कार्य से उनकी सालाना आय लगभग 3.60 लाख रुपये तक पहुंच गई है।
50 हजार दीदियां, 126 करोड़ टर्नओवर
हाल ही में जीविका दीदियों ने अपने हुनर और मेहनत से बड़ी उपलब्धि हासिल की है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आवासीय विद्यालयों और आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों के लिए उन्होंने अब तक 90 लाख ड्रेस सिली हैं। जीविका के सहयोग से गठित जानकी जीविका महिला स्टिचिंग प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड को यह काम सौंपा गया था। कंपनी के नेतृत्व में करीब 50 हजार जीविका दीदियों ने मिलकर इसे पूरा किया। उन्होंने अपने हुनर और शिल्पकारी से लाखों बच्चों तक आकर्षक ड्रेस पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। इसका असर कंपनी के कारोबार पर भी दिखा है। वर्ष 2023-24 में मात्र 19 लाख रुपये की आमदनी करने वाली कंपनी का टर्नओवर अब 126 करोड़ रुपये हो चुका है।
हुनर को मिला संस्थागत रूप
सिलाई से जुड़ी पहल को संस्थागत और व्यापक स्वरूप देने के लिए वर्ष 2023 में जानकी जीविका महिला सिलाई प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड का गठन किया गया। अब जीविका दीदियों को विभिन्न सरकारी विभागों से बड़े पैमाने पर वर्क ऑर्डर मिल रहे हैं। वे स्कूली बच्चों के लिए आकर्षक यूनिफॉर्म तैयार करने के साथ-साथ अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए भी कपड़े सिल रही हैं।
विभिन्न विभागों के साथ मिलकर जीविका दीदियां 149.7 करोड़ रुपये का शुद्ध व्यवसाय कर चुकी हैं। उन्होंने रिकॉर्ड 68,77,557 परिधान तैयार कर विभिन्न संस्थानों को उपलब्ध कराए हैं। सिलाई कार्य को मजबूत करने के लिए राज्य के 15 जिलों में नोडल केंद्र स्थापित किए गए हैं, जहां 1,365 आधुनिक सिलाई मशीनों से गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के साथ तकनीकी प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
जीविका दीदियों के लिए सिलाई अब केवल आमदनी का जरिया नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, वित्तीय समझ और नेतृत्व की ओर बढ़ने का माध्यम बन गई है।