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वैश्विक कृषि बाजार में ब्रिक्स का नया दाव : डॉलर के दबदबे को चुनौती, नई अनाज विनिमय व्यवस्था

संतोष कुमार पांडेय, स्तंभकार, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 18 Oct 2026 02:53 PM IST
सार

44% खाद्यान्न व एक-तिहाई कृषि भूमि ब्रिक्स देशों के पास है। वैश्विक व्यापार में पश्चिमी कंपनियों के दबदबे से मूल्य-निर्धारण में ब्रिक्स की ताकत सीमित है। अब नई व्यवस्था के तहत विकल्प खोजे जा रहे हैं।

डॉलर के दबदबे को चुनौती, नई अनाज विनिमय व्यवस्था
डॉलर के दबदबे को चुनौती, नई अनाज विनिमय व्यवस्था - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की कृषि घोषणा अहम है। भारत की अध्यक्षता में पहली बार ब्रिक्स के कृषि एजेंडा में अनाज व्यापार व मूल्य-व्यवस्था, बीज एवं अन्य इनपुट्स, डिजिटल खेती, जलवायु-सहनशील कृषि और वैश्विक व्यापार नियमों पर गहन चर्चा हुई।

घोषणा में ब्रिक्स अनाज विनिमय व्यवस्था को आगे बढ़ाने, किसान-केंद्रित इनपुट, आनुवंशिक संसाधन और सूचना नेटवर्क (एग्रीन), किसानों के बीज अधिकारों के वैश्विक मंच, कृषि पारिस्थितिकी व पुनर्योजी कृषि के उत्कृष्टता केंद्र और डिजिटल कृषि नेटवर्क पर सहमति बनी। खाद्य आपूर्ति संकट, उर्वरक उपलब्धता, राष्ट्रीय खाद्य भंडार और जलवायु-अनुकूल बीजों पर भी जोर दिया गया।

11 स्थाई सदस्यों वाले ब्रिक्स देश दुनिया के 44% खाद्यान्न का नियंत्रण करते हैं, वैश्विक कृषि योग्य भूमि का करीब एक-तिहाई उनके पास है और 25% से अधिक खपत भी यहीं होती है। फिर भी मूल्य-निर्धारण में उनकी ताकत इस अनुपात में नहीं दिखती। भारत सहित कई सदस्य एक साथ बड़े उत्पादक, निर्यातक, उपभोक्ता और आयातक हैं। भारत चावल का प्रमुख निर्यातक होने के साथ ही खाद्य तेल और दालों का बड़ा आयातक है।

मिस्र गेहूं का बड़ा आयातक है और ब्राजील सोयाबीन का सबसे बड़ा निर्यातक देश है। इसके बावजूद आयात-निर्यात में इन देशों के किसानों और अर्थव्यवस्था को नुकसान होता रहा है। इसका मुख्य कारण वैश्विक कृषि व्यापार के करीब 80% पर पश्चिम के चार कॉरपोरेट घरानों, एडीएम, बंज, कारगिल और ड्रेफस (एबीसीडी कार्टेल), का नियंत्रण है, जिससे फसलों और उर्वरकों के दाम शिकागो या लंदन के वायदा बाजारों और डॉलर में तय होते हैं। कीमतें बढ़ें तो आयातकों का विदेशी मुद्रा भंडार घटता है और गिरें तो निर्यातक किसानों की लागत भी नहीं निकलती। 

ब्रिक्स घोषणा का अहम बिंदु अनाज विनिमय व्यवस्था को जमीन पर उतारने का निर्णय है। यह डिजिटल मंच पश्चिमी बिचौलियों और डॉलर की विनिमय दर के जोखिम से बचाकर स्थानीय मुद्रा में सीधा, पारदर्शी व्यापार संभव बनाएगा, जिससे पोटाश और फॉस्फेट जैसे उर्वरकों की आपूर्ति स्थिर होगी और भारत का उर्वरक सब्सिडी खर्च नियंत्रित रहेगा।

भारत के लिए वैश्विक कृषि बाजार के पुनर्गठन का मतलब केवल निर्यात बढ़ाना नहीं है। किसान की आय, उपभोक्ता की थाली, खाद्य सुरक्षा व रणनीतिक भंडार के प्रश्न भी उतने ही अहम हैं। ब्रिक्स घोषणा में खाद्य कीमतों की स्थिरता, आपूर्ति संकट, उर्वरक की कमी, राष्ट्रीय खाद्य भंडार और जलवायु-सहनशील बीज प्रणालियों का उल्लेख महत्वपूर्ण है। 

जलवायु परिवर्तन के दौर में एक देश की फसल विफलता दूसरे देश की खाद्य कीमतों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए, उत्पादन, भंडारण, आपूर्ति और इनपुट के जोखिम साझा करने की क्षमता भारत के लिए निर्यात बाजार से बड़ा रणनीतिक लाभ हो सकती है। यह तभी संभव है, जब ब्रिक्स देश एक-दूसरे का विकल्प नहीं, पूरक बनें। किसी के पास अनाज, किसी के पास उर्वरक और इनपुट, किसी के पास बड़ा उपभोक्ता बाजार और किसी के पास विविध कृषि प्रणालियों का अनुभव है।

किसान को यह भी जानना होता है कि फसल की कीमत क्या मिल सकती है, भंडारण के क्या विकल्प हैं और उस कीमत में उसकी हिस्सेदारी कैसे बढ़े? अनाज विनिमय व्यवस्था का लाभ खेत तक तभी पहुंचेगा, जब उसके मूल्य संकेत मंडियों, किसान उत्पादक संगठनों और किसान संगठनों तक सीधे पहुंचें।

इस सम्मेलन का संदेश साफ है कि भारत सहित ब्रिक्स देश अब दुनिया के लिए केवल अनाज उगाने वाले या बाजार उपलब्ध कराने वाले मोहरे बनकर नहीं रहेंगे। स्थानीय मुद्रा में अनाज विनिमय, बीज अनुसंधान और प्रौद्योगिकी साझेदारी के नए प्रारूप ने भारत को वैश्विक कृषि नीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। पर, इस पूरे विमर्श का बुनियादी सवाल यही है कि क्या इनसे खेत में खून-पसीना बहाने वाले किसान को उसकी फसल का सही मूल्य मिलेगा?

बीज अधिकार और आनुवंशिक संसाधनों पर सहयोग केवल शोध का मामला नहीं है। सवाल यह है कि किसान जलवायु-सहनशील किस्मों तक कितनी आसानी और किस लागत पर पहुंच पाएगा और उसके पारंपरिक बीज-ज्ञान की क्या भूमिका होगी। यदि नीति सरकारों, केंद्रीय बैंकों, कस्टम विभागों व बड़े कॉर्पोरेट समूहों के बीच कागजी लेनदेन आसान करने तक सीमित रही, तो ब्रिक्स कृषि तंत्र महज ब्यूरोक्रेटिक ढांचा बनकर रह जाएगा।

इसे किसान-केंद्रित बनाने के लिए तीन शर्तें जरूरी हैं। पहली, एफपीओ और कृषि सहकारी समितियां डिजिटल अनाज विनिमय प्रणाली से सीधे जुड़ें, ताकि वे बासमती, चाय या मसाले बिना बिचौलियों के विदेशी खरीदार को बेच सकें। दूसरी, सदस्य देश एक-दूसरे की वार्षिक कृषि जरूरतों का पारदर्शी डेटा साझा करें, जिससे किसान लाभदायक फसल चुन सकें और अत्यधिक उत्पादन से दाम न गिरें।

तीसरी, जलवायु-सहनशील बीजों और कृषि पारिस्थितिकी का ज्ञान शोध पत्रों तक सीमित न रहकर कृषि विज्ञान केंद्रों के जरिए खेत तक पहुंचे। यही तय करेगा कि ब्रिक्स की पहल किसानों के लिए सूचना, बाजार और अवसरों का साझा मंच बनेगी। 
 
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