बिहार के सीतामढ़ी में सिंगल यूज प्लास्टिक को रीसाइकिल कर टिकाऊ बेंच तैयार की जा रही हैं। ‘कचरे से कंचन’ पहल के तहत करीब 3.5 टन प्लास्टिक से 85 बेंच बनाई गईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में इस मॉडल की सराहना करते हुए इसे ‘वेस्ट टू वेल्थ’ का उदाहरण बताया।
बिहार के सीतामढ़ी में प्लास्टिक कचरा अब समस्या नहीं, बल्कि उपयोगी संसाधन बनने की राह पर है। सिंगल यूज प्लास्टिक को रीसाइकिल कर मजबूत बेंच-डेस्क और अन्य उपयोगी वस्तुएं तैयार की जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 जुलाई 2026 को ‘मन की बात’ के 136वें एपिसोड में इस पहल की सराहना करते हुए इसे ‘वेस्ट टू वेल्थ’ का शानदार उदाहरण बताया।
चार प्रखंडों में शुरू हुई पहल
‘कचरे से कंचन’ पहल लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान यानी स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के तहत शुरू की गई। सीतामढ़ी जिला प्रशासन ने 19 फरवरी 2026 को बाजपट्टी, रुन्नीसैदपुर, डुमरा और रीगा की प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट्स को सक्रिय करने के लिए राय इंडस्ट्री, बक्सर के साथ एमओयू किया।
11 हजार किलो प्लास्टिक का संग्रह
बाजपट्टी प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट में जिलेभर से करीब 11 हजार किलो सिंगल यूज प्लास्टिक एकत्र किया गया। इसमें से करीब 3.5 टन प्लास्टिक को रीसाइकिल कर 85 मजबूत बेंच तैयार की गईं। इनकी उपयोग अवधि करीब 25-30 वर्ष बताई गई है। 16 जून 2026 को बाजपट्टी में इन बेंचों के वितरण की शुरुआत की गई। इन्हें विभिन्न पंचायतों के पंचायत सरकार भवनों, सार्वजनिक स्थलों और अन्य जनोपयोगी परिसरों में लगाया जा रहा है।
तकनीक से प्लास्टिक को मिला नया जीवन
इस पहल से जुड़ी राय इंडस्ट्री, बक्सर प्लास्टिक कचरे से लकड़ी जैसे स्लैब तैयार करती है। इनसे पार्क बेंच, डेस्क, अलमारी और अन्य फर्नीचर बनाए जा रहे हैं। कंपनी के संस्थापक संजीत राय के मुताबिक प्लास्टिक को फेंकने, जमीन में दबाने या जलाने के बजाय तकनीक के जरिए उपयोगी संसाधन में बदलना ज्यादा टिकाऊ रास्ता है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ रोजगार की संभावनाएं भी बनती हैं।
हर दिन निकलता है हजारों टन प्लास्टिक
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2022-23 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सालाना करीब 39 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ। यानी प्रतिदिन लगभग 10,700 टन। सरकार ने 1 जुलाई 2022 से चिन्हित कई सिंगल यूज प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध भी लगाया, लेकिन इनके संग्रह और वैज्ञानिक निस्तारण की चुनौती अब भी बनी हुई है।
सीतामढ़ी मॉडल को राज्यभर में विस्तार
‘मन की बात’ में चर्चा के बाद सीतामढ़ी मॉडल को व्यापक पहचान मिली। इसके बाद बिहार में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने पर राज्यस्तरीय परामर्श कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें उद्यमियों, रिसाइक्लर्स, कबाड़ व्यवसायियों, स्वयं सहायता समूहों, प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और तकनीकी संस्थानों ने संग्रहण से लेकर प्रसंस्करण और बाजार तक की व्यवस्था मजबूत करने पर मंथन किया।
सीतामढ़ी की पहल यह संकेत देती है कि सही तकनीक और स्थानीय भागीदारी से प्लास्टिक कचरे को बोझ के बजाय संसाधन में बदला जा सकता है। अब चुनौती इस मॉडल को टिकाऊ बनाते हुए बिहार के दूसरे जिलों तक पहुंचाने की है।
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