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मिसाल : नौकरी छूटी तो खेती बनी कमाई का जरिया, डेढ़ एकड़ से सालाना 8-10 लाख रुपये की बचत- देखें Video

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sun, 06 Sep 2026 07:10 PM IST
सार

  • बैंक की नौकरी छूटने के बाद कपिल जमदग्नि ने खेती को अपना करियर बनाया।
  • डेढ़ एकड़ जमीन से सालाना 8-10 लाख रुपये की शुद्ध बचत कर रहे हैं।
  • एक एकड़ में ताइवान की 8-10 किस्मों के करीब 550 अमरूद के पेड़ लगाए हैं।
  • सिंधी बासमती धान, हल्दी, मक्का, सूरजमुखी और सोनामोती गेहूं की भी खेती करते हैं।

नौकरी छूटी तो खेती बनी कमाई का जरिया
नौकरी छूटी तो खेती बनी कमाई का जरिया - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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नौकरी जाने के बाद खेती को करियर बनाना और कम जमीन से लाखों रुपये की कमाई करना आसान नहीं है, लेकिन हरियाणा के सोनीपत जिले के शहजादपुर गांव निवासी कपिल जमदग्नि ने इसे संभव कर दिखाया है। बैंक की नौकरी छूटने के बाद कपिल ने खेती का रास्ता चुना और पिछले छह साल से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। कपिल के पास करीब डेढ़ एकड़ जमीन है। इसी जमीन पर खेती, प्रोसेसिंग और सीधे ग्राहकों को बिक्री करके वह सालाना करीब 8 से 10 लाख रुपये की शुद्ध बचत कर रहे हैं।

एक एकड़ में लगाए 550 अमरूद के पेड़
कपिल ने अपनी करीब एक एकड़ जमीन में ताइवान की 8-10 किस्मों के लगभग 550 अमरूद के पौधे लगाए हैं। इसके अलावा बची जमीन पर वह सिंधी बासमती धान, हल्दी, मक्का, सूरजमुखी और सोनामोती गेहूं की खेती करते हैं। अलग-अलग फसलों की खेती करने से उन्हें सालभर आमदनी का जरिया मिलता रहता है।

मंडी में नहीं, खेत से सीधे बेचते हैं फसल
कपिल अपनी उपज को पारंपरिक तरीके से मंडी में बेचने के बजाय खेत पर बनी दुकान से सीधे ग्राहकों को बेचते हैं। इससे उन्हें अपनी उपज की बेहतर कीमत मिलती है। वह सिर्फ कच्ची फसल बेचने पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन पर भी ध्यान देते हैं। उदाहरण के लिए, दाग वाले अमरूद से सिरका और हल्दी से पाउडर तैयार करते हैं।

इसी तरह गन्ने से शुद्ध रस और सिरका भी तैयार करते हैं। उनका सिंधी बासमती चावल करीब 200 रुपये प्रति किलो और गन्ने का सिरका करीब 250 रुपये प्रति लीटर तक बिकता है। प्रोसेसिंग से तैयार उत्पादों की कीमत बढ़ने के साथ उनकी कमाई भी बढ़ती है।

देसी गायों से तैयार करते हैं प्राकृतिक खेती का घोल
कपिल खेती में रासायनिक खाद और खरपतवारनाशी का इस्तेमाल नहीं करते। वह दो देसी गायों के गोबर और गोमूत्र से तैयार कल्चर का इस्तेमाल खेती में करते हैं। उनका कहना है कि प्राकृतिक खेती में लागत को नियंत्रित करने के साथ मिट्टी की सेहत पर भी ध्यान दिया जा सकता है।

सुबह खेत, फिर संभालते हैं दुकान
कपिल रोजाना सुबह 6 बजे से 10 बजे तक खेत में काम करते हैं। इसके बाद वह अपनी दुकान संभालते हैं और ग्राहकों को सीधे कृषि उत्पाद बेचते हैं। वह कुरुक्षेत्र गुरुकुल में मास्टर ट्रेनर के रूप में भी काम करते हैं और प्राकृतिक खेती से जुड़ी जानकारी किसानों तक पहुंचाते हैं।

किसानों के लिए क्या है सीख?
कपिल का मानना है कि किसान सिर्फ फसल उगाने और उसे मंडी में बेचने तक सीमित न रहें। अगर किसान उत्पादन के साथ प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन और सीधे ग्राहकों को बिक्री पर ध्यान दें, तो कम जमीन से भी अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है।

 
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