धरती की प्यास जब बढ़ने लगी, कुओं का जलस्तर नीचे जाने लगा और खेतों तक पानी पहुंचाना कठिन होने लगा, तब छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले ने एक ऐसा फैसला लिया, जो केवल खेती का नहीं, बल्कि भविष्य बचाने का निर्णय माना जा रहा है।
बेमेतरा जिले की 425 ग्राम पंचायतों ने सामूहिक रूप से ग्रीष्मकालीन धान की खेती नहीं करने का संकल्प लिया है। इसके स्थान पर श्रीअन्न (मिलेट्स), दलहन तथा तिलहन जैसी कम पानी वाली फसलों को अपनाने का रास्ता चुना है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है, जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और जल संकट की दोहरी चुनौती से जूझ रही है। बेमेतरा ने इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए टिकाऊ कृषि की नई मिसाल पेश की है।
पानी की बढ़ती चिंता ने बदली सोच
बेमेतरा कृषि प्रधान जिला है, जहां लगभग 80 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है। खरीफ सीजन में जिले के 2.25 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में से करीब 2.05 लाख हेक्टेयर में धान बोया जाता रहा है। लेकिन, लगातार घटती वर्षा और बढ़ते जल दोहन ने स्थिति को चिंताजनक बना दिया।
वर्ष 2024-25 में जिले में केवल 600 मिलीमीटर वर्षा हुई, जबकि सामान्य औसत 995 मिलीमीटर है। इसके बावजूद, ग्रीष्मकालीन धान का रकबा 26,680 हेक्टेयर तक पहुंच गया। परिणामस्वरूप कई गांवों में हैंडपंप और ट्यूबवेल सूखने लगे, पेयजल संकट गहराया और बिजली की खपत तेजी से बढ़ी।
धान की एक किलोग्राम उपज तैयार करने में औसतन 2,500 से 3,000 लीटर पानी की आवश्यकता पड़ती है। गर्मी के मौसम में यह मांग और अधिक बढ़ जाती है। यही वह मोड़ था, जहां किसानों और पंचायतों ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए नई दिशा चुनने का फैसला किया।
पंचायतों ने किया ऐतिहासिक फैसला
जिले की सभी 425 ग्राम पंचायतों ने ग्रीष्मकालीन धान की खेती सीमित कर कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने का प्रस्ताव पारित किया और अब किसानों की सक्रिय भागीदारी से यह पहल जनआंदोलन का रूप ले चुकी है। जागरूकता अभियानों के माध्यम से किसानों को जल संरक्षण और टिकाऊ खेती का महत्व समझाया गया।
धान के स्थान पर अब बाजरा, रागी, कोदो, कुटकी, मक्का, चना, मसूर, सरसों और सूरजमुखी जैसी फसलें लोकप्रिय हो रही हैं। कम पानी और कम लागत में बेहतर उत्पादन देने वाली ये फसलें पोषण के साथ मृदा स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी हैं।
जिला प्रशासन और कृषि विभाग के प्रयासों से किसानों को उन्नत बीज, प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन मिला। इसका परिणाम यह रहा कि ग्रीष्मकालीन धान का रकबा घटकर 5,139 हेक्टेयर रह गया, जबकि दलहन क्षेत्र 70,800 से बढ़कर 83,330 हेक्टेयर हो गया। तिलहन क्षेत्र में भी लगभग तीन गुना वृद्धि दर्ज की गई।
श्रीअन्न के लिए उपयुक्त प्रदेश
छत्तीसगढ़ की जलवायु और मिट्टी श्रीअन्न (मिलेट्स) की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है। कम वर्षा और सूखे जैसी परिस्थितियों में भी अच्छी उपज देने वाली ये फसलें जलवायु-स्मार्ट कृषि का मजबूत आधार बन रही हैं। इसी कारण राज्य सरकार इनके विस्तार को बढ़ावा दे रही है।
केंद्र सरकार की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, न्यूट्री-सीरियल्स सब-मिशन, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और मूल्य समर्थन योजना जैसी पहलें भी मिलेट्स को प्रोत्साहित कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष 2023 के बाद देश-विदेश में श्रीअन्न की बढ़ती मांग ने भी किसानों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं।
मिलेट्स कैफे से मिली प्रेरणा
रायगढ़ का मिलेट्स कैफे छत्तीसगढ़ में श्रीअन्न को लोकप्रिय बनाने की सफल पहल बन चुका है। इसकी सराहना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘मन की बात’ में की थी। इसने साबित किया कि श्रीअन्न केवल खेती की फसल नहीं, बल्कि रोजगार और उद्यमिता का सशक्त माध्यम भी है।
बेमेतरा की पहल केवल एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि जल, पर्यावरण और किसान हितों को साथ लेकर चलने वाली दूरदर्शी सोच का उदाहरण है। 425 पंचायतों का यह सामूहिक संकल्प दिखाता है कि जागरूक समुदाय बड़े बदलाव ला सकता है।
(यह लेख मूल रूप से गांव जंक्शन पत्रिका के जून 2026 अंक में प्रकाशित किया गया है।)
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