वीरगाथाओं की यह परंपरा बुंदेलखंड के लिए केवल संगीत नहीं, एक संस्कृति, एक अस्मिता और एक मान-सम्मान की धरोहर रही है। इसी अमूल्य धरोहर को बुंदेली कलाकार बचाए हुए हैं। इन्हीं में से एक हैं लोकगायक छोटेलाल, ये फतेहपुर जिले के पैनाखुर्द गांव के रहने वाले हैं। पेशे से पशुपालक हैं, लेकिन इनकी रग-रग में लोक काव्य आल्हा-ऊदल बसा हुआ है।
छोटेलाल कहते हैं कि तीन-चार दशक पहले तक बुंदेलखंड में हर सावन-भादों में आल्हा की रातें जीवन का हिस्सा थीं। जहां कलाकार 6-8 घंटे निरंतर गाते थे और श्रोता गर्व से झूम उठते थे, आज वही परंपरा धीरे-धीरे मोबाइल स्क्रीन और डीजे की तेज रोशनी में धुंधली होती जा रही है। वे खुद 30 सालों से इस परंपरा का हिस्सा हैं।
छोटेलाल कहते हैं, “अरे ये पुराना इतिहास है साहब! आल्हा-ऊदल कैसे वीर रहे- यह बुजुर्गन की चर्चा रही है।" वह बताते हैं, “भीड़ तो घट गई है, पहले जहां प्रोग्राम लगता रहा, भारी भीड़ हो जाती रही। रात भर आल्हा गाया जाता रहा। अब आदमी मोबाइल मा सुन लेत है।” छोटेलाल के मंच छोटे नहीं रहे। उन्होंने बताया, “हम बहुत दूर-दूर गाए हैं साहब।”
मायूसी भरी आवाज में वह कहते हैं, "कला से सम्मान तो मिला, पर रोटी नहीं। प्रोग्राम से कमाई कम हो पाती। अब तो भैंस-बकरी चारा रहे हैं।" जब उनसे पूछा गया कि क्या युवा इस परंपरा को आगे ले जाएंगे? वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, “तैयार हैं! दो छेला (युवक) सीख रहे। इतिहास बंद थोड़े ना होई।” उम्मीद की यह छोटी-सी लौ शायद आल्हा के भविष्य की सबसे बड़ी रोशनी है।
छोटेलाल की टीम जिला स्तर पर चैंपियन रह चुकी है। आकाशवाणी, लखनऊ और संस्कृति विभाग के कार्यक्रमों में बुलावा आता है, लेकिन यह सहयोग अनियमित और सीमित है। वह बताते हैं कि एक कार्यक्रम में पांच कलाकार होते हैं। इनमें खड़ताल, ढोलक, मंजीरा और झींका वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है।
पहाड़ों-बीहड़ों के बागियों से लेकर डकैतों और स्थानीय योद्धाओं तक ने आल्हा को प्रेरणा माना है। आज से मात्र तीन-चार दशक पहले तक सावन की रातें, गांवों के चौक, मंदिरों के आंगन और शहरों के मोहल्ले सब जगह आल्हा के स्वर गूंजते थे। दूरदर्शन के शुरुआती दौर में भी आल्हा कलाकार लाखों घरों तक पहुंचे हैं।