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आल्हा-ऊदल की अमर कथा : मोबाइल में सिमट रही बुंदेलखंड की वीरगाथा

मोहम्मद आमिल, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 22 Dec 2025 04:48 PM IST
सार

रात के सन्नाटे में जब कोई आल्हा गाता है, ढोलक-मंजीरे की थापें और गायक की भर्राई आवाज मिलकर ऐसा दृश्य रच देती हैं कि सुनने वाला भी मानो युद्धभूमि में पहुंच जाता है। वीरता, संस्कृति और अस्मिता का प्रतीक यह परंपरा आज तकनीकी मनोरंजन और बदलती जीवनशैली की वजह से धीरे-धीरे फीकी पड़ती जा रही है।

बुंदेलखंड की वीरगाथा: आल्हा-ऊधल
बुंदेलखंड की वीरगाथा: आल्हा-ऊधल - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की धरती पर जब हवा चलती है, तो उसके साथ सदियों पुरानी गर्व भरी आल्हा और ऊदल की वीरता की गूंज भी बहती है। लेकिन आज के आधुनिक दौर में वीरता भरी यह गूंज थमने लगी है। साल दर साल इस लोक काव्य के कलाकार कम हो रहे हैं, और बुंदेलखंड की यह वीरगाथा विलुप्ति की कगार पर खड़ी है। 

आल्हा-ऊदल दो योद्धाओं की कहानी है। साथ ही यह बुंदेली धरा की आत्मा है, जहां साहस जन-जन में रचा-बसा है। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में कई भारतीय सैन्य छावनियों में आल्हा गायक बुलाए जाते थे। कहते हैं कि आल्हा की “बारह बरस लौं कूकर जीये…” पक्तियां स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में ऐसा जोश भर देती थीं कि वे मौत को भी हंसते-हंसते गले लगा लेते थे।

लोकगीत आल्हा-ऊदल- एक शौर्य गाथा

आल्हा-ऊदल केवल एक लोकगीत नंहीं, बल्कि मध्यकालीन उत्तर भारत की राजनीतिक घटनाओं, वंश संघर्षों और स्थानीय शौर्य परंपराओं से जुड़ा ऐतिहासिक दस्तावेज भी मानी जाती है। यह कथा 12वीं सदी के उत्तर भारत की राजनीति तीन राजवंशों चौहान, गाहड़वाल (कन्नौज) और चंदेल के संघर्षों से बनी हुई है। इतिहासकार कहते हैं कि अनंगपाल तोमर की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार विवाद ने पृथ्वीराज चौहान और जयचंद राठौड़ के बीच शत्रुता को जन्म दिया। 

लगभग इसी समय बुंदेलखंड में चंदेल राजा परमर्दिदेव (परमाल) का शासन था, जिसे पृथ्वीराज ने 1182 ई. में चुनौती दी, और महोबा का बड़ा भाग अपने अधीन कर लिया। इस युद्ध में परमाल के पक्ष से दो भाई आल्हा और ऊदल चट्टान बनकर खड़े हो गए। उनकी तलवारों की चमक और शौर्य ऐसा था कि बड़े-बड़े योद्धा भी दंग रह जाते थे। राजा भले ही हार गया, पर इन दोनों की बहादुरी, वफादारी और बलिदान बुंदेलखंड के लोगों के हृदय में अमर हो गए। इन दोनों योद्धाओं की महिमा को आल्हा गाथा के माध्यम से बुंदेली भाषा में सुनाया जाता है।

डीजे और मोबाइल में गुम होते लोकगीत

वीरगाथाओं की यह परंपरा बुंदेलखंड के लिए केवल संगीत नहीं, एक संस्कृति, एक अस्मिता और एक मान-सम्मान की धरोहर रही है। इसी अमूल्य धरोहर को बुंदेली कलाकार बचाए हुए हैं। इन्हीं में से एक हैं लोकगायक छोटेलाल, ये फतेहपुर जिले के पैनाखुर्द गांव के रहने वाले हैं। पेशे से पशुपालक हैं, लेकिन इनकी रग-रग में लोक काव्य आल्हा-ऊदल बसा हुआ है। 

छोटेलाल कहते हैं कि तीन-चार दशक पहले तक बुंदेलखंड में हर सावन-भादों में आल्हा की रातें जीवन का हिस्सा थीं। जहां कलाकार 6-8 घंटे निरंतर गाते थे और श्रोता गर्व से झूम उठते थे, आज वही परंपरा धीरे-धीरे मोबाइल स्क्रीन और डीजे की तेज रोशनी में धुंधली होती जा रही है। वे खुद 30 सालों से इस परंपरा का हिस्सा हैं।

अरे ये पुराना इतिहास है साहब! 

छोटेलाल कहते हैं, “अरे ये पुराना इतिहास है साहब! आल्हा-ऊदल कैसे वीर रहे- यह बुजुर्गन की चर्चा रही है।" वह बताते हैं, “भीड़ तो घट गई है, पहले जहां प्रोग्राम लगता रहा, भारी भीड़ हो जाती रही। रात भर आल्हा गाया जाता रहा। अब आदमी मोबाइल मा सुन लेत है।” छोटेलाल के मंच छोटे नहीं रहे। उन्होंने बताया, “हम बहुत दूर-दूर गाए हैं साहब।” 

मायूसी भरी आवाज में वह कहते हैं, "कला से सम्मान तो मिला, पर रोटी नहीं। प्रोग्राम से कमाई कम हो पाती। अब तो भैंस-बकरी चारा रहे हैं।" जब उनसे पूछा गया कि क्या युवा इस परंपरा को आगे ले जाएंगे? वह मुस्कुराते हुए कहते हैं, “तैयार हैं! दो छेला (युवक) सीख रहे। इतिहास बंद थोड़े ना होई।” उम्मीद की यह छोटी-सी लौ शायद आल्हा के भविष्य की सबसे बड़ी रोशनी है।

पांच कलाकार सजाते हैं मंच

छोटेलाल की टीम जिला स्तर पर चैंपियन रह चुकी है। आकाशवाणी, लखनऊ और संस्कृति विभाग के कार्यक्रमों में बुलावा आता है, लेकिन यह सहयोग अनियमित और सीमित है। वह बताते हैं कि एक कार्यक्रम में पांच कलाकार होते हैं। इनमें खड़ताल, ढोलक, मंजीरा और झींका वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है। 

पहाड़ों-बीहड़ों के बागियों से लेकर डकैतों और स्थानीय योद्धाओं तक ने आल्हा को प्रेरणा माना है। आज से मात्र तीन-चार दशक पहले तक सावन की रातें, गांवों के चौक, मंदिरों के आंगन और शहरों के मोहल्ले सब जगह आल्हा के स्वर गूंजते थे। दूरदर्शन के शुरुआती दौर में भी आल्हा कलाकार लाखों घरों तक पहुंचे हैं।

 


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