भारत में कमजोर मानसून के कारण खराब हुई फसलों और इथेनॉल कारखानों की बढ़ती मांग के चलते मुर्गी के चारे की कीमतों में भारी उछाल आया है। चारे की बढ़ती लागत की वजह से पोल्ट्री उद्योग का मुनाफा लगातार कम हो रहा है।
चारे में मक्के की हिस्सेदारी और आसमान छूते दाम
मुर्गियों के वजन को बढ़ाने वाले चारे में मक्के की हिस्सेदारी 55 से 65 प्रतिशत तक होती है। पोल्ट्री उद्योग के अनुमानों के अनुसार, जो मक्का साल 2019 में किसानों को 12 से 14 रुपये प्रति किलो मिलता था, उसकी कीमत सितंबर के आखिर में बढ़कर 27 से 28 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई। वहीं, सरकार के कृषि बाजार सूचना नेटवर्क एगमार्कनेट के आंकड़ों के अनुसार, 8 अक्टूबर को थोक मंडियों में मक्के का औसत राष्ट्रीय भाव लगभग 23 रुपये प्रति किलो था। 'सीएलएफएमए ऑफ इंडिया' (CLFMA of India) के अध्यक्ष दिव्या कुमार गुलाटी का कहना है कि पोल्ट्री क्षेत्र में ऊर्जा, परिवहन और कच्चे माल की लागत बढ़ने का सीधा असर चारे के महंगे होने के रूप में सामने आता है।
मानसून की बेरुखी और सूखे से मक्का उत्पादन में भारी गिरावट
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अनुसार, भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून इस बार सामान्य से 13 प्रतिशत कम रहा है, जिससे मक्के की बुवाई (रकबा) में गिरावट आई है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों, तेलंगाना और राजस्थान में सूखे को लेकर चिंताएं जताई गई हैं। जानकार का अनुमान है कि कर्नाटक में सूखे के कारण मक्के के उत्पादन में 25 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है। पसुपार्थी के अनुसार, इथेनॉल के लिए मक्के की मांग और कर्नाटक में फसल खराब होना इस संकट का मुख्य कारण है। इस कमी को पूरा करने के लिए अब बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से मक्का मंगाया जा रहा है।
चूजों की कमी और उत्पादन लागत का बढ़ता दबाव
ब्रीडर स्तर पर उत्पादन घटने से बाजार में चूजों की उपलब्धता भी कम हो गई है, जिससे पोल्ट्री कंपनियों की लागत और अधिक बढ़ गई है। पसुपार्थी के अनुसार, महंगे चारे और चूजों की कमी के कारण आने वाले महीनों में उत्पादन लागत में भारी वृद्धि होने वाली है। इस संकट से बचने के लिए पोलट्री कंपनी मक्के का स्टॉक बढ़ाने पर विचार कर रही हैं।