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हर व्यक्ति साफ पानी का हकदार : गांव में सिर्फ नल होना काफी नहीं, जीफ जस्टिस ने सुरक्षित पेयजल को बताया जरूरी

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 12 Oct 2026 01:51 PM IST
सार

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि ग्रामीण परिवारों को केवल नल कनेक्शन देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि साफ और नियमित पेयजल उपलब्ध कराना भी जरूरी है। उन्होंने जल स्रोतों की सुरक्षा को मानवाधिकार और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी बताया। जानिए, विस्तार से...

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आर्सेनिक, फ्लोराइड और दूसरे हानिकारक तत्वों से दूषित पानी लोगों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरा है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आर्सेनिक, फ्लोराइड और दूसरे हानिकारक तत्वों से दूषित पानी लोगों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरा है। - फोटो : सांकेतिक तस्वीर
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विस्तार
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गांवों में हर घर नल से जल पहुंचाना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन केवल नल लगा देना पर्याप्त नहीं है। पानी साफ, सुरक्षित और जरूरत के समय उपलब्ध भी होना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने सोमवार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के 33वें स्थापना दिवस समारोह में यह बात कही है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आर्सेनिक, फ्लोराइड और दूसरे हानिकारक तत्वों से दूषित पानी लोगों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए खतरा है। विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि जिस समुदाय को भरोसेमंद जलापूर्ति नहीं मिलती, वह संविधान में दिए गए सम्मानजनक जीवन के अधिकार का पूरा लाभ नहीं उठा सकता।

नल कनेक्शन के साथ सुरक्षित पानी भी जरूरी
CJI ने कहा कि भारत ने ग्रामीण इलाकों में घर-घर नल कनेक्शन पहुंचाने के लिए बड़े स्तर पर काम किया है। इस प्रगति की सराहना होनी चाहिए, लेकिन अब यह देखना जरूरी है कि पानी पीने योग्य है या नहीं, नियमित मिलता है या नहीं और परिवार की जरूरत के समय उपलब्ध रहता है या नहीं।

उन्होंने कहा कि जिस नल में पानी नहीं आता, वह अपने उद्देश्य को पूरा नहीं करता। इसी तरह, दूषित पानी की आपूर्ति लोगों की सेहत के लिए खतरा बन सकती है।

पानी बचाना आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी
सूर्यकांत ने कहा कि पानी का अधिकार केवल आज की पीढ़ी तक सीमित नहीं है। भूजल का लगातार गिरता स्तर, नदियों का प्रदूषण और पेयजल स्रोतों का खराब होना आने वाली पीढ़ियों पर भी बोझ डालता है। इसलिए जल स्रोतों को सुरक्षित रखना सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि सरकार को पानी पहुंचाने वाली व्यवस्थाएं बनानी और उनका रखरखाव करना चाहिए। अदालतों को अधिकारों के उल्लंघन पर हस्तक्षेप करना चाहिए, जबकि मानवाधिकार आयोग को शिकायतों की जांच कर व्यवस्था की कमियों को सामने लाना चाहिए।

33 साल में 24 लाख से ज्यादा मामले दर्ज
NHRC के 33 साल के कामकाज का उल्लेख करते हुए CJI ने बताया कि आयोग में अब तक 24 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए हैं और 23 लाख से ज्यादा का निपटारा किया जा चुका है। निपटारे की दर 98 प्रतिशत से अधिक रही है।

उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल उल्लंघन की पहचान करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। पीड़ितों को राहत मिलनी चाहिए, जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए, जिससे उल्लंघन दोबारा न हो।

कमजोर लोगों की आवाज बनना जरूरी
CJI ने कहा कि मानवाधिकार संस्था की असली सफलता केवल निपटाए गए मामलों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि वह समाज के सबसे कमजोर लोगों की आवाज कितनी प्रभावी ढंग से सुनती है।

CJI ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की व्याख्या अब सम्मानजनक जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, आवास, आजीविका और स्वच्छ पर्यावरण तक विस्तृत हो चुकी है। उन्होंने NHRC के मोबाइल ऐप शुरू करने और रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण की पहल की भी सराहना की। 
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