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Rice Export: इराक को चावल भेजने का भारत ने निकाला सस्ता रास्ता, माल ढुलाई खर्च 74% घटाने की तैयारी

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 12 Oct 2026 03:29 PM IST
सार

  • 1,02,210 टन चावल भेजने की व्यवस्था: तीन बड़े मालवाहक जहाजों के जरिए इराक को बासमती चावल पहुंचाया जाएगा।

  • माल ढुलाई खर्च में 74% कटौती का लक्ष्य: प्रस्तावित दर 350 डॉलर से घटाकर करीब 90 डॉलर प्रति टन करने की योजना है।

  • प्रति टन 260 डॉलर की संभावित बचत: प्रस्तावित दरों के आधार पर निर्यातकों को माल ढुलाई में राहत मिल सकती है।

  • एक जहाज पहुंचा बंदरगाह: एमवी लामार एस उम्म कसर बंदरगाह पहुंच चुका है और चावल उतारने का काम शुरू हो गया है।

बासमती चावल
बासमती चावल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारतीय चावल निर्यातकों ने पश्चिम एशिया में बढ़ती माल ढुलाई लागत और कंटेनरों की कमी से निपटने के लिए नया रास्ता निकाला है। भारतीय चावल निर्यातक संघ (IREF) ने तीन बड़े मालवाहक जहाजों के जरिए इराक को 1,02,210 टन बासमती चावल भेजने की व्यवस्था की है। इस पहल का उद्देश्य माल ढुलाई की लागत को करीब 350 डॉलर प्रति टन से घटाकर 90 डॉलर प्रति टन करना है। इससे प्रति टन लगभग 260 डॉलर की बचत हो सकती है। संघ के मुताबिक, इस व्यवस्था से माल ढुलाई खर्च में करीब 74 प्रतिशत तक कमी लाने का लक्ष्य है।

तीन जहाजों से इराक पहुंचेगा बासमती चावल
भारतीय चावल निर्यातक संघ ने सिंगापुर की कंपनी एक्सिमवाला सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ मिलकर यह व्यवस्था की है। इसके तहत तीन जहाज इराक के उम्म कसर बंदरगाह पर चावल पहुंचाएंगे। संघ के अनुसार, 36,810 टन चावल लेकर गया जहाज एमवी लामार एस बंदरगाह पहुंच चुका है। जहाज तीसरे बर्थ पर खड़ा है और चावल उतारने का काम शुरू हो गया है। वहीं, एमवी लोलो गेट 25,500 टन और एमवी आउटलैंडर 39,900 टन चावल लेकर जाएंगे।

प्रस्तावित माल ढुलाई दरों के आधार पर तीनों जहाजों से चावल भेजने पर कुल करीब 2.66 करोड़ डॉलर की बचत का अनुमान है। हालांकि, वास्तविक बचत अंतिम खर्च और खेप भेजने की शर्तों पर निर्भर करेगी।

पश्चिम एशिया भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा बाजार
पश्चिम एशिया भारतीय बासमती चावल के निर्यात का प्रमुख बाजार है। भारतीय चावल निर्यातक संघ के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 में समाप्त वित्त वर्ष के दौरान भारत ने पश्चिम एशिया को 45.64 लाख टन बासमती चावल निर्यात किया। इसकी कीमत 34,284 करोड़ रुपये थी। यह भारत के कुल बासमती चावल निर्यात का करीब 70 प्रतिशत है।

अगर गैर-बासमती चावल को भी शामिल किया जाए, तो इसी अवधि में पश्चिम एशिया को कुल 56.48 लाख टन चावल निर्यात किया गया, जिसका मूल्य 39,657 करोड़ रुपये रहा। ऐसे में जहाजरानी का खर्च कम करना भारतीय निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण है। माल ढुलाई महंगी होने से चावल की कुल लागत बढ़ती है और विदेशी बाजारों में भारतीय चावल की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।

सऊदी अरब, ईरान और इराक बड़े खरीदार
वित्त वर्ष 2025-26 में सऊदी अरब भारतीय बासमती चावल का पश्चिम एशिया में सबसे बड़ा बाजार रहा। यहां 8,324 करोड़ रुपये मूल्य का बासमती चावल निर्यात किया गया। इसके बाद ईरान में 6,970 करोड़ रुपये, इराक में 5,583 करोड़ रुपये और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में 4,132 करोड़ रुपये मूल्य का बासमती चावल भेजा गया। इसी अवधि में इराक ने भारत से करीब 7.64 लाख टन बासमती चावल खरीदा। इससे इस बाजार के लिए नियमित और किफायती परिवहन व्यवस्था बनाए रखने का महत्व समझा जा सकता है।

निर्यातकों को लागत घटाने में मिलेगी मदद
भारतीय चावल निर्यातक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देव गर्ग के मुताबिक, पश्चिम एशिया का भारत के बासमती चावल निर्यात में करीब 70 प्रतिशत हिस्सा है। ऐसे में जहाजरानी की बढ़ती लागत भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा पर सीधा असर डालती है।

उन्होंने कहा कि माल ढुलाई का खर्च 350 डॉलर से घटाकर 90 डॉलर प्रति टन करने का लक्ष्य बेहतर परिवहन व्यवस्था के जरिए निर्यातकों और विदेशी खरीदारों, दोनों को फायदा पहुंचाने की कोशिश है। संघ खाड़ी के दूसरे बाजारों में भी इस तरह की व्यवस्था लागू करने की संभावनाएं तलाश रहा है।

माल ढुलाई का खर्च कम होने से निर्यातकों को अपना मुनाफा बचाने और विदेशी बाजारों में चावल की कीमत प्रतिस्पर्धी रखने में मदद मिल सकती है। कंटेनरों की कमी के समय बड़े जहाजों से माल भेजना परिवहन का एक वैकल्पिक तरीका बन सकता है। हालांकि, इस व्यवस्था की सफलता बड़े जहाजों की उपलब्धता, बंदरगाहों पर माल चढ़ाने और उतारने के खर्च, समय पर खेप पहुंचने और अलग-अलग खरीदारों की जरूरतों पर निर्भर करेगी।

चावल निर्यात पर दिल्ली में होगी चर्चा
यह पहल 23 से 25 अक्टूबर 2026 तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होने वाले भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन (BIRC) 2026 से पहले हुई है।सम्मेलन में जहाजरानी से जुड़े मुद्दों पर एक विशेष सत्र आयोजित किया जाएगा। इसमें बड़े मालवाहक जहाजों और कंटेनरों से परिवहन के खर्च, माल बीमा, बंदरगाहों पर देरी, समुद्री परिवहन अनुबंध और विवादों को रोकने जैसे विषयों पर चर्चा होगी।

इस पहल से भारतीय चावल निर्यातकों को बढ़ती लॉजिस्टिक लागत से राहत मिलने की उम्मीद है। यदि बड़े जहाजों के जरिए परिवहन दूसरे बाजारों में भी व्यावहारिक साबित होता है, तो इससे भारत के चावल निर्यात को मजबूती मिल सकती है।
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