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Govt S Price Cut On Maize Ethanol Grain Distillers Unhappy Sugar Industry Welccomed
मक्के के इथेनॉल के भाव पर कैंची: ₹3 प्रति लीटर की कटौती से अनाज आधारित डिस्टलरीज नाराज, चीनी उद्योग को राहत
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Umashankar Mishra
Updated Wed, 21 Oct 2026 01:01 PM IST
सार
तेल विपणन कंपनियों ने इथेनॉल कार्यक्रम शुरू होने के बाद पहली बार मक्का से बने इथेनॉल की खरीद कीमत 3 रुपये प्रति लीटर घटाई है। अनाज आधारित डिस्टलरीज इससे नाराज हैं। सी-हैवी शीरे और टूटे चावल के भाव पिछले साल जैसे ही रखे गए हैं। चीनी उद्योग ने जहां फैसले का स्वागत किया है, वहीं इस कदम को समर्पित इथेनॉल संयंत्रों को तरजीह देने के खिलाफ चेताया भी है।
अनाज आधारित डिस्टलरीज इथेनॉल के भाव में कटौती के फैसले से नाखुश हैं।
- फोटो : सोशल मीडिया
इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम शुरू होने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) ने मक्के से बने इथेनॉल की खरीद कीमत घटाई है। यह कटौती 3 रुपये प्रति लीटर की है। अनाज आधारित डिस्टलरीज इस फैसले से नाखुश हैं, जबकि चीनी उद्योग ने इसका स्वागत किया है। हालांकि, चीनी उद्योग ने यह चेतावनी भी दी है कि केवल इथेनॉल बनाने वाले समर्पित संयंत्रों को खास तरजीह नहीं मिलनी चाहिए।
याद रहे कि वर्ष 2022–23 के इथेनॉल आपूर्ति वर्ष (ईएसवाई) में मक्के वाले इथेनॉल की शुरुआती खरीद कीमत कम रखी गई थी। बाद में इसे बढ़ाया गया और अब पहली बार इसमें कमी की गई है।
बाकी कच्चे माल के भाव जस के तस
ईएसवाई 2026–27 के लिए सी-हैवी शीरे (सीएचएम) से बने इथेनॉल का भाव 57.97 रुपये प्रति लीटर और क्षतिग्रस्त अनाज यानी टूटे चावल से बने इथेनॉल का भाव 64 रुपये प्रति लीटर रखा गया है। दोनों दरें 2025–26 वाली ही हैं। उधर सरकार ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा बेचे जाने वाले चावल की दर में 1.82 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है।
गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे पर पाबंदी
2023–24 में गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे (बीएचएम) से इथेनॉल बनाने पर रोक लगी थी और तब सरकार ने भाव नहीं बढ़ाए थे। इस बार भी सरकार ने ईएसवाई 2026–27 के लिए इनके भाव घोषित नहीं किए हैं। साथ ही साफ किया गया है कि ओएमसी गन्ने के रस, सिरप और बीएचएम से बना इथेनॉल नहीं खरीदेंगी।
1,100 करोड़ लीटर की पहली निविदा
ओएमसी ने ईएसवाई 2026–27 (नवंबर से अक्टूबर) के लिए विभिन्न कच्चे माल से बने 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद की पहली निविदा जारी की है। इसमें पहली और दूसरी तिमाही में 300-300 करोड़ लीटर तथा तीसरी और चौथी तिमाही में 250-250 करोड़ लीटर खरीदा जाएगा।
सूत्रों का तर्क, कटौती स्वाभाविक थी
सूत्रों के मुताबिक अनाज आधारित भट्टियों ने नैफेड के ज़रिये शुरू की गई मक्के की एमएसपी पर तय खरीद योजना का कभी समर्थन नहीं किया, क्योंकि जब बाज़ार भाव सरकारी भाव से कम थे, तब वे एमएसपी देने को तैयार नहीं थीं।
इथेनॉल का भाव मक्के के चालू बाज़ार भाव और औसत उत्पादन (रिकवरी) को आधार बनाकर तय हुआ था, इसलिए उसमें नीचे की ओर संशोधन भी स्वाभाविक था। सूत्र यह भी कहते हैं कि चीनी उद्योग को यह सुविधा नहीं मिलती, क्योंकि चीनी मिलों को गन्ना किसानों को कम से कम उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) देना ही पड़ता है, जो हर साल बढ़ता है।
वर्ष 2022–23 में दो बार बदला था भाव
वर्ष 2022–23 में अनाज आधारित भट्टियों के दबाव में सरकार को सत्र के बीच में दो बार इथेनॉल की ख़रीद दरें बढ़ानी पड़ी थीं। मक्के के बाज़ार भाव चढ़ने से घाटे का हवाला देकर भट्टियों ने तब काम बंद कर दिया था।
अनाज डिस्टलरीज की ये है दलील
ग्रेन इथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (जीईएमए) के अध्यक्ष सी.के. जैन के अनुसार, संतुलित इथेनॉल नीति को मक्का और चावल दोनों से टिकाऊ उत्पादन का सहारा देना चाहिए। दोनों की लागत अलग है, इसलिए ख़रीद भाव में यह फ़र्क़ झलकना चाहिए और उत्पादकों को आवंटन की वाजिब झलक भी मिलनी चाहिए। उनका कहना है कि जब सस्ते चावल से बना इथेनॉल उपलब्ध है, तब मक्के का प्रोत्साहन घटाने से मक्के वाले उत्पादन का गणित और किसानों के लिए बनता बाज़ार कमज़ोर पड़ सकता है।
जैन के मुताबिक सरकार और ओएमसी को भाव और आवंटन की एक साथ समीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि उद्योग की निवेश चुकाने और अनाज की ख़रीद बनाए रखने की क्षमता दोनों पर टिकी है। अतिरिक्त चावल मिश्रण कार्यक्रम में मदद कर सकता है, पर उसे मक्के की ओर बढ़ते क़दम का पूरक होना चाहिए, उसे कमज़ोर नहीं करना चाहिए।
चीनी उद्योग की मांग और चेतावनी
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (इस्मा) के महानिदेशक दीपक बल्लानी ने सीएचएम से बने इथेनॉल की ख़रीद कीमत बढ़ाकर 62.23 रुपये प्रति लीटर करने की मांग की है। उनका कहना है कि मौजूदा निविदा में दीर्घकालिक खरीद अनुबंध (एलटीओए) वाले समर्पित इथेनॉल संयंत्रों (डीईपी) को तरजीही आवंटन पहले से मिल रहा है, पर आगे के वर्षों में भी यह जारी रहा तो चीनी उद्योग के हित गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
बल्लानी के अनुसार, अगर अधिशेष वाले सत्रों में डीईपी को तरजीह के कारण चीनी मिलों की इथेनॉल ख़रीद तक पहुंच सीमित रही, तो उनकी आमदनी का एक अहम स्रोत छिन जाएगा, उनका वित्तीय संकट गहराएगा और गन्ना किसानों को समय पर एफआरपी चुकाने की उनकी क्षमता कमज़ोर होगी। उनका तर्क है कि डीईपी को लगातार तरजीह देना इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के उसी मक़सद को बेमानी कर देगा, जिसमें चीनी उद्योग की नकदी सुधारना और गन्ने का बकाया समय पर चुकाना शामिल है।
घरेलू चीनी की ज़रूरत सबसे ऊपर
गन्ने के रस और बीएचएम से इथेनॉल बनाने पर रोक का समर्थन करते हुए इस्मा ने कहा कि घरेलू चीनी की खपत सर्वोच्च प्राथमिकता रहनी चाहिए। इस सत्र में यह और भी ज़रूरी है, क्योंकि उभरती अल-नीनो परिस्थितियां और प्रमुख गन्ना क्षेत्रों में मौसम की अनिश्चितता गन्ने की पैदावार और चीनी उत्पादन पर असर डाल सकती हैं।
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