अफ्रीकी देशों ने खाद्य सुरक्षा के लिए चावल का भंडार बढ़ाना शुरू कर दिया है। अल नीनो की आशंका और यूक्रेन-ईरान युद्ध जैसी भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच ये देश भारत से पहले के मुकाबले ज्यादा चावल खरीद रहे हैं। बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल की कीमतों पर असर पड़ा है। पिछले कुछ महीनों में भारतीय चावल की कीमतों में करीब 20 फीसदी बढ़ोतरी हुई है।
नई दिल्ली के चावल निर्यातक राजेश पाहड़िया जैन के मुताबिक, अफ्रीकी देश भविष्य की जरूरत को देखते हुए अतिरिक्त चावल खरीदकर भंडार बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि काकीनाडा बंदरगाह पर एक समय में करीब 20 जहाज चावल लोड करने के लिए खड़े हैं। इन जहाजों के जरिए करीब 6 लाख टन चावल भेजा जा सकता है।
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन के उपाध्यक्ष (पश्चिम बंगाल) सूरज अग्रवाल ने कहा कि कई बंदरगाहों पर जहाज चावल उठाने के इंतजार में हैं। इसके पीछे अल नीनो के साथ यूक्रेन और ईरान युद्ध भी प्रमुख कारण हैं। युद्ध और मौसम को लेकर कई देशों में खाद्य सुरक्षा की चिंता बढ़ी है और कुछ देश सामान्य से दोगुनी मात्रा में चावल खरीद रहे हैं।
वियतनाम में फंसे भारतीय जहाज
हालांकि, चावल निर्यात के सामने कुछ मुश्किलें भी हैं। राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष मुकेश जैन के मुताबिक, कुछ निर्यातक पुराने सौदों की आपूर्ति कर रहे हैं, लेकिन ईरान युद्ध के कारण शिपमेंट में देरी हुई है।
वहीं, वियतनाम के रास्ते चावल निर्यात में भी परेशानी सामने आई है। तमिलनाडु एग्री कमोडिटीज एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मदन प्रकाश के अनुसार, फिलीपींस ने चावल का आयात रोक दिया है। इसके असर से वियतनाम में भी कारोबार प्रभावित हुआ है और भारतीय चावल लेकर पहुंचे कुछ जहाजों को समुद्र में इंतजार करना पड़ रहा है। इस बीच वियतनामी चावल की कीमतों में गिरावट आई है।
भाड़ा बढ़ने से भी महंगा हुआ चावल
निर्यातकों के अनुसार, चावल की कीमत बढ़ने की एक बड़ी वजह शिपिंग लागत में भारी बढ़ोतरी भी है। राजेश पाहड़िया जैन ने बताया कि मई में 5 फीसदी टूटे हुए पारबॉयल्ड चावल की कीमत करीब 335 डॉलर प्रति टन थी, जो अब बढ़कर करीब 390 डॉलर प्रति टन हो गई है।
सूरज अग्रवाल के मुताबिक, मुंबई से दुबई के जेबेल अली बंदरगाह तक एक कंटेनर भेजने का भाड़ा करीब 100 डॉलर से बढ़कर 5,000 डॉलर तक पहुंच गया है। खोर फक्कन बंदरगाह पर जहाजों की संख्या बढ़ने से भी माल भेजने में देरी हो रही है। जहां पहले जेबेल अली तक चावल पहुंचने में 5 दिन से एक सप्ताह लगता था, वहीं अब करीब एक महीने तक लग रहा है।
कमजोर मानसून से उत्पादन पर असर
निर्यातकों ने इस साल भारत में चावल उत्पादन को लेकर भी चिंता जताई है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान कई इलाकों में बारिश देर से हुई, कुछ जगह कम बारिश हुई तो कहीं जरूरत से ज्यादा बारिश और बेमौसम बारिश हुई। इससे कुछ क्षेत्रों में धान की फसल प्रभावित हुई है।
राजेश पाहड़िया जैन के अनुसार, इस साल चावल का उत्पादन पिछले साल की तुलना में कम से कम 10 फीसदी घट सकता है। खासकर प्रीमियम गैर-बासमती चावल के उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका है। पिछले साल खरीफ सीजन में भारत ने रिकॉर्ड 12.45 करोड़ टन चावल का उत्पादन किया था। इस साल कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में धान के रकबे में तेज गिरावट दर्ज की गई है।
जलाशयों में कम पानी से बढ़ी चिंता
कुछ राज्यों में जलाशयों में पानी का स्तर भी चिंता का कारण बना हुआ है। उदाहरण के तौर पर कर्नाटक ने रबी फसलों के लिए पानी छोड़ने के बजाय उसे पीने के पानी के लिए सुरक्षित रखने की बात कही है। इससे दक्षिण भारत में चावल की कुछ किस्मों की कीमत बढ़ी है।
सूरज अग्रवाल के मुताबिक, सोना मसूरी की कीमत कुछ महीने पहले 45-46 रुपये किलो थी, जो अब बढ़कर 58-59 रुपये किलो हो गई है। वहीं स्वर्णा मसूरी की कीमत 31-32 रुपये से बढ़कर करीब 36 रुपये किलो हो गई है। IR64 चावल के लिए निर्यातक करीब 2,450 रुपये प्रति क्विंटल दे रहे हैं। यह सामान्य चावल के मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2,441 रुपये प्रति क्विंटल से भी ज्यादा है।
चावल निर्यात में बढ़ोतरी
APEDA के आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में अप्रैल-जुलाई के दौरान भारत का चावल निर्यात बढ़ा है। इस अवधि में 54 लाख टन चावल का निर्यात हुआ, जिसकी कीमत करीब 1.97 अरब डॉलर रही। पिछले साल इसी अवधि में 44.8 लाख टन चावल का निर्यात हुआ था, जिसकी कीमत 1.87 अरब डॉलर थी।
देश में चावल का पर्याप्त भंडार
हालांकि, भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास मौजूद बड़े भंडार से घरेलू आपूर्ति को लेकर तत्काल चिंता कम होती है। सितंबर के मध्य तक FCI के पास करीब 3.91 करोड़ टन चावल और 3.075 करोड़ टन धान का भंडार था। धान से करीब 2.06 करोड़ टन चावल मिलने का अनुमान है।
निर्यातकों का कहना है कि इन भंडारों के कारण अगर मौसम का असर रबी के चावल उत्पादन पर भी पड़ता है, तब भी देश में चावल की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। निर्यातकों के अनुमान के मुताबिक, भारत चालू वित्त वर्ष में बासमती समेत करीब 2.2 से 2.3 करोड़ टन चावल का निर्यात कर सकता है। अगर अल नीनो का असर ज्यादा गंभीर रहता है तो यह आंकड़ा 2.4 करोड़ टन तक पहुंच सकता है।
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