खाने के तेल का घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए कृषि लागत और मूल्य आयोग ने सरकार को बड़ा सुझाव दिया है। आयोग के अनुसार, तिलहन की MSP को वैज्ञानिक आधार पर उसमें मौजूद तेल की मात्रा से जोड़ा जाना चाहिए।
सीएसीपी 23 फसलों के लिए सरकार को एमएसपी की सिफारिश करता है। आयोग ने अपनी मूल्य नीति रिपोर्ट में कहा है कि जिस तिलहन की खेप में तेल की मात्रा तय मानक से अधिक होगी, उसके लिए किसानों को अनुपात के हिसाब से अधिक कीमत (प्रीमियम) दी जानी चाहिए। इसके अलावा, देश में राइस ब्रान जैसे घरेलू विकल्पों की प्रचुर उपलब्धता को देखते हुए इनसे भी तेल उत्पादन बढ़ाने का सुझाव दिया गया है।
रबी तिलहनों की एमएसपी में बढ़ोतरी और खाद्य तेल के आयात की वर्तमान स्थिति
सरकार खरीफ और रबी के तिलहनों जैसे सोयाबीन, मूंगफली, सरसों और कुसुम के लिए एमएसपी की घोषणा करती है। फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए 2027-28 के मार्केटिंग सीजन के लिए सरसों और कुसुम जैसी तिलहन फसलों की एमएसपी में 6.6 प्रतिशत से 10 प्रतिशत तक की वृद्धि की गई है। हालांकि, मौजूदा समय में मंडियों में कीमतें एमएसपी दरों से ऊपर चल रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपनी कुल खपत का लगभग 58 प्रतिशत खाद्य तेल आयात करता है, जिसमें मुख्य रूप से पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी का तेल शामिल है। तेल वर्ष 2024-25 में यह आयात 18.3 अरब डॉलर का रहा है। घरेलू खाद्य तेलों में सरसों की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत, सोयाबीन की 24 प्रतिशत और मूंगफली की 7 प्रतिशत है। सीएसीपी की रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य तेल के आयात पर यह उच्च निर्भरता इसलिए है क्योंकि घरेलू खपत तेजी से बढ़ रही है और इसके मुकाबले तिलहन उत्पादन के अनुपात में तेल उत्पादन की रफ्तार धीमी है।
आयोग ने खाद्य तेल की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बेहतर तकनीकों, उन्नत कृषि विधियों, बीजों की उच्च तेल मात्रा वाली किस्में विकसित करने और किसानों को ऐसे बीज बोने के लिए प्रोत्साहित करने की व्यापक रणनीति की सिफारिश भी की है।
दलहन की खरीद में आने वाली रुकावटें और सरकारी एजेंसियों के सामने चुनौतियां
दलहन की खरीद पर टिप्पणी करते हुए सीएसीपी ने बताया कि कई राज्यों में खरीद शुरू होने में देरी, गोदामों की कमी, सीमित खरीद केंद्र और किसानों के बीच खरीद प्रक्रियाओं को लेकर जागरूकता की कमी जैसी कई बाधाएं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ राज्यों में दालों की खरीद को जमीनी रिकॉर्ड और फसल के डेटाबेस से जोड़ा गया है, जिससे डेटाबेस में किसी भी तरह की गड़बड़ी होने पर समय पर खरीद प्रभावित होती है। कृषि मंत्रालय द्वारा मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के तहत राज्यों के प्रस्तावों को मंजूरी देने और राज्यों द्वारा वास्तव में खरीद शुरू करने के बीच काफी समय का अंतर देखा गया है।
भारत अपनी दालों की सालाना खपत का लगभग 18 से 20 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, जिसका मूल्य वित्त वर्ष 2026 में 3.57 अरब डॉलर रहा है। नाफेड और एनसीसीएफ जैसी एजेंसियों के बारे में आयोग ने बताया कि बड़े पैमाने पर खरीद के दौरान उन्हें वैज्ञानिक भंडारण की कमी और संचालन से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा कुछ राज्य सरकारों से पीएम-आशा (PM-AASHA) योजना के तहत जरूरी फंड न मिलने के कारण किसानों के भुगतान में भी देरी होती है। ज्ञात हो कि पीएम-आशा योजना में पीएसएस, मूल्य स्थिरीकरण कोष, मूल्य घाटा भुगतान योजना और बाजार हस्तक्षेप योजना शामिल हैं।
कृषि मंडियों में बुनियादी ढांचे का अभाव और भारी टैक्स को तर्कसंगत बनाने की जरूरत
कृषि मंडियों की स्थिति पर सीएसीपी ने कहा है कि देश के कृषि बाजारों में बुनियादी ढांचे की कमी है और ओवर-रेगुलेशन के साथ भारी वैधानिक टैक्स एवं बाजार शुल्क जैसी समस्याएं भी मौजूद हैं। आयोग के अनुसार, कृषि उपज की खरीद-बिक्री पर लगने वाली उच्च मंडी फीस और अन्य शुल्कों से बाजार का संतुलन बिगड़ता है और निजी व्यापारी बाजार से बाहर हो जाते हैं। इसलिए इन मंडी शुल्कों को तर्कसंगत (कम) करने की सिफारिश की गई है।
मंडी में लेनदेन के लिए गुजरात और बिहार जैसे राज्य कोई शुल्क नहीं लेते हैं, जबकि अन्य जगहों पर यह शुल्क 1 से 3 प्रतिशत तक होता है। इसमें पंजाब और हरियाणा में लगने वाला 2 प्रतिशत ग्रामीण विकास उपकर और फिक्स आढ़तिया कमीशन शामिल नहीं है।
आयोग ने सुझाव दिया है कि इसे एक पारदर्शी और समान व्यवस्था के तहत लाया जाना चाहिए ताकि राज्यों के बीच स्वतंत्र व्यापार को बढ़ावा मिले, प्रतिस्पर्धा मजबूत हो और राष्ट्रीय कृषि बाजार का उद्देश्य पूरा हो सके। सीएसीपी ने यह भी कहा है कि मंडियों के पास अनाज सुखाने, साफ करने की सुविधा और गुणवत्ता जांचने के लिए प्रयोगशालाएं स्थापित की जानी चाहिए।