साल 2025-26 के गन्ना पेराई सीजन में महाराष्ट्र एक बार फिर उत्तर प्रदेश को पीछे छोड़कर भारत का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य बन गया है। इस दौरान राज्य में 1,044.21 लाख टन गन्ने की पेराई हुई और 99.20 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ। वहीं, उत्तर प्रदेश में लगभग 89 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ। हालांकि, जानकारों के अनुसार, बाहर से दिखने वाली इस बड़ी सफलता के पीछे एक गंभीर जल संकट और उत्पादन की अस्थिरता की कहानी छिपी हुई है, जिस पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।
मौसम पर निर्भरता और पानी की भारी खपत से जुड़ी चुनौतियां
पिछले पांच सीजनों के आंकड़े देखें तो राज्य के चीनी उत्पादन में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। साल 2021-22 में रिकॉर्ड 137.28 लाख टन चीनी बनी थी, जो 2024-25 के सूखे के दौरान गिरकर मात्र 80.76 लाख टन रह गई और अब 2025-26 में यह फिर से 99.20 लाख टन पर आ गई है। सीएसीपी (CACP) और इक्रियर (ICRIER) के आकलनों के अनुसार, गन्ना राज्य के कुल कृषि क्षेत्र के केवल 5-6 प्रतिशत हिस्से में बोया जाता है (जो एक दशक पहले 4% था), लेकिन यह सिंचाई के लिए उपलब्ध कुल पानी का 60 से 70 प्रतिशत सोख लेता है।
मराठवाड़ा जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्र में राज्य के गन्ने का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा उगाया जाता है। इसमें लातूर और धाराशिव जैसे जिले शामिल हैं, जहां अक्सर पानी की कमी रहती है। इस संकट के बावजूद, सरकारी आदेशों के बाद भी अब तक गन्ने के केवल 35 प्रतिशत क्षेत्र में ही पानी बचाने वाली सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप इरिगेशन) प्रणाली का उपयोग हो रहा है, जो खेती के ढांचे को कमजोर बना रहा है।
सूखे का सीधा असर और मिलों की क्षमता से कम गन्ने की उपलब्धता
जब मानसून अच्छा होता है, तो मिलें लंबे समय तक चलती हैं। लेकिन बारिश कम होने पर पूरी व्यवस्था चरमरा जाती है। 2024-25 के सूखे के दौरान गन्ने की पैदावार गिरकर 78 टन प्रति हेक्टेयर रह गई थी। इसके कारण मिलें सामान्य 130-150 दिनों की तुलना में मुश्किल से 90 दिन ही चल पाई थीं। इससे बिजली बनाने के लिए खोई (बगास), डिस्टिलरी के लिए शीरा (मोलासेस) की कमी हो गई और किसानों को मिलने वाले एफआरपी (FRP) भुगतान के लिए नकदी पर भी बुरा असर पड़ा।
जानकारों के अनुसार, 2025-26 में 99.20 लाख टन उत्पादन का मुख्य कारण अच्छे मानसून के साथ-साथ गन्ने के रकबे (खेती के क्षेत्र) में 20 प्रतिशत की वृद्धि होना है। गन्ने का क्षेत्रफल 13.7 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 16.4 लाख हेक्टेयर हो गया है, जिसे राज्य के जल संसाधनों के लिहाज से सही नहीं माना जा रहा है। वर्तमान में राज्य की 200 से अधिक चीनी मिलों को 160 दिन की आदर्श अवधि तक चलाने के लिए सालाना लगभग 1,520 लाख टन गन्ने की जरूरत होती है। साल 2021-22 के सबसे बेहतरीन सीजन में भी यह जरूरत केवल 87 प्रतिशत ही पूरी हो पाई थी, जबकि सूखे के साल में मिलों को अपनी क्षमता का मात्र 56 प्रतिशत गन्ना ही मिल पाया।
खेती का दायरा बढ़ाने के बजाय प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाने पर जोर
जानकारों के अनुसार, गन्ने की कमी को पूरा करने के लिए गन्ने का क्षेत्रफल (जमीन) बढ़ाना संभव नहीं है क्योंकि राज्य पहले से ही भूजल की कमी और पीने के पानी के संकट का सामना कर रहा है। इसका एकमात्र उपाय यह है कि कम पानी और कम जमीन में वैज्ञानिक तरीके से ज्यादा पैदावार ली जाए। राज्य को नई मिलें लगाने के बजाय पानी की हर बूंद से गन्ने की अच्छी पैदावार लेने की जरूरत है।
सरकारी अनुमानों के अनुसार, 2025-26 में गन्ने की पैदावार लगभग 94 टन प्रति हेक्टेयर रही है। असली चुनौती यह है कि 2027-28 तक, सूखे के वर्षों में भी ड्रिप सिंचाई, नई किस्म के बीजों और मिट्टी की नमी नापने वाली तकनीक के माध्यम से औसतन 95 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार को बनाए रखा जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसा होता है, तो गन्ने के कुल क्षेत्रफल में लगभग 8 प्रतिशत की कमी की जा सकेगी। इससे 1.3 लाख हेक्टेयर उपजाऊ और सिंचित जमीन खाली होगी, जिस पर कम पानी मांगने वाली फसलें जैसे तिलहन, दलहन या मोटे अनाज उगाए जा सकेंगे। इससे खेती में संतुलन आएगा और पानी की भी भारी बचत होगी।