किसानों को सौर ऊर्जा उपलब्ध कराने वाली प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (PM-KUSUM) योजना के दूसरे चरण को पहले से बेहतर बनाने की जरूरत है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के मुताबिक, योजना के पहले चरण में कुछ कामों में अच्छी प्रगति हुई, लेकिन कई राज्यों में परियोजनाओं को लागू करने की रफ्तार धीमी रही। ऐसे में दूसरे चरण में केवल लक्ष्य बढ़ाने के बजाय जमीन, बिजली ग्रिड, वित्त और किसानों को मिलने वाले वास्तविक लाभ पर ध्यान देना होगा।
CSE ने 27 अक्टूबर 2026 को आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार ‘रीडिजाइनिंग पीएम-कुसुम 2.0’ में योजना के दूसरे चरण को बेहतर बनाने के सुझाव दिए। संस्था का कहना है कि परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले उनकी तैयारी, वित्तीय व्यवस्था, बिजली ग्रिड से जुड़ने की क्षमता और किसानों की जरूरतों का आकलन होना चाहिए।
पहले चरण में 11.9 लाख सोलर पंप लगे
CSE के कार्यक्रम प्रबंधक बिनीत दास के मुताबिक, पीएम-कुसुम योजना का पहला चरण मार्च 2026 में समाप्त हुआ। इसमें अलग-अलग घटकों के तहत प्रगति एक जैसी नहीं रही। योजना के तहत अब तक करीब 11.9 लाख स्टैंडअलोन सोलर पंप लगाए गए हैं। यह निर्धारित लक्ष्य का लगभग 90 फीसदी है। वहीं, विकेंद्रीकृत ग्रिड से जुड़े सौर बिजली संयंत्रों की क्षमता करीब 2,400 मेगावाट तक पहुंची, जबकि लक्ष्य 10,000 मेगावाट का था।
योजना के अलग-अलग घटकों में राज्यों के प्रदर्शन में भी अंतर रहा। कुछ राज्यों में खास घटकों के तहत बहुत कम या कोई प्रगति नहीं हुई। CSE के अनुसार, सोलर पंप जैसी किसान-केंद्रित योजनाओं में काम तेजी से हुआ, लेकिन बिजली ग्रिड से जुड़ी परियोजनाओं के लिए कई विभागों, बिजली वितरण कंपनियों, बैंकों, डेवलपर और जमीन मालिकों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है।
दूसरे चरण में इन पांच बातों पर देना होगा ध्यान
CSE ने पीएम-कुसुम 2.0 को बेहतर बनाने के लिए परियोजनाओं की तैयारी, वित्तीय व्यवस्था, बिजली ग्रिड, किसानों की भागीदारी और नतीजों की निगरानी पर जोर दिया है।
1. जमीन और बिजली ग्रिड की पहले जांच हो
सौर परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले यह देखना चाहिए कि जमीन उपलब्ध है या नहीं, बिजली ग्रिड में पर्याप्त क्षमता है या नहीं और जरूरी मंजूरियां मिल सकती हैं या नहीं। खरीद और वित्त की व्यवस्था भी पहले से तैयार होनी चाहिए। इससे परियोजनाओं को मंजूरी मिलने के बाद काम अटकने की आशंका कम होगी।
2. सौर परियोजनाओं के लिए लाभकारी दर तय हो
सौर ऊर्जा परियोजनाओं की लागत तय करते समय जमीन, ढांचे, ग्रिड कनेक्शन, कर्ज, रखरखाव और बीमा जैसे खर्चों को शामिल करना जरूरी है। CSE ने यह भी कहा कि बिजली वितरण कंपनियों की ओर से भुगतान में देरी होने पर परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है। इसलिए बिल और भुगतान की स्पष्ट समय-सीमा के साथ बकाया भुगतान निपटाने की व्यवस्था होनी चाहिए।
3. खेती और सौर ऊर्जा दोनों को मिले बढ़ावा
दूसरे चरण में एग्री-वोल्टाइक यानी एक ही जमीन पर खेती और सौर बिजली उत्पादन की व्यवस्था को शामिल करने की बात कही गई है। हालांकि, इसके लिए फसल की जरूरत, स्थानीय मौसम और खेती के कामों को ध्यान में रखना होगा। छोटे किसानों और बटाई पर खेती करने वालों के लिए भी वित्त और योजना का लाभ लेने की उचित व्यवस्था होनी चाहिए।
4. सिंचाई के साथ पानी के इस्तेमाल पर भी ध्यान
सोलर पंप से सिंचाई की लागत घट सकती है, लेकिन बिजली सस्ती होने से भूजल का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भी बढ़ सकता है। इसलिए सौर सिंचाई के साथ जल प्रबंधन और भूजल संरक्षण के उपाय जरूरी हैं।
5. योजना की निगरानी और किसानों को मिलने वाले लाभ का आकलन हो
CSE ने एकीकृत प्रदर्शन डैशबोर्ड बनाने का सुझाव दिया है। इसके जरिए परियोजना को मंजूरी मिलने से लेकर टेंडर, स्थापना और संचालन तक की जानकारी दर्ज की जा सकती है। साथ ही सब्सिडी और वित्त की स्थिति, बिजली उत्पादन, ग्रिड की उपलब्धता, मशीनों के रखरखाव और किसानों को हुए लाभ की निगरानी भी होनी चाहिए।
51 हजार करोड़ रुपये तक के प्रस्ताव की चर्चा
योजना के दूसरे चरण की तैयारी के बीच सार्वजनिक रिपोर्टों में इसके लिए मौजूदा देनदारियों सहित 51,000 करोड़ रुपये तक की संभावित वित्तीय जरूरत का जिक्र किया गया है। हालांकि, अंतिम बजट, पात्रता की शर्तों और क्रियान्वयन के नियमों को औपचारिक सरकारी मंजूरी मिलना बाकी है।
CSE का कहना है कि योजना की सफलता केवल लगाए गए सोलर पंपों या स्थापित सौर क्षमता से नहीं मापी जानी चाहिए। यह भी देखना होगा कि किसानों की लागत कितनी घटी, उनकी अतिरिक्त आय कितनी बढ़ी, फसल उत्पादन पर क्या असर पड़ा और पानी का इस्तेमाल कितना हुआ।
वेबिनार में इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (IISD) की नीति सलाहकार प्रियामी दत्ता ने कहा कि पीएम-कुसुम 2.0 की सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि खेती की जमीन पर कितनी सौर क्षमता स्थापित हुई, इसके बजाय यह देखा जाए कि जमीन पर निर्भर किसानों को कितना वास्तविक लाभ मिला।
CSE के मुताबिक, दूसरे चरण में परियोजनाओं को केवल मंजूरी देने के बजाय उनकी तैयारी और वास्तविक परिणामों के आधार पर आगे बढ़ाना चाहिए। साथ ही, संबंधित मंत्रालयों और एजेंसियों की जिम्मेदारियां तय हों तथा स्वतंत्र आकलन से यह जांच की जाए कि परियोजनाएं सही ढंग से चल रही हैं या नहीं और उनसे किसानों व पर्यावरण को अपेक्षित लाभ मिल रहा है या नहीं।
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