खाद सब्सिडी पर बढ़ते खर्च और मिट्टी की खराब होती गुणवत्ता से निपटने के लिए पीएम मोदी राज्यों को एग्री स्टैक वाली खाद वितरण व्यवस्था अपनाने की सलाह देंगे। यह जानकारी सूत्रों के हवाले से सामने आई है। इन नई व्यवस्था के तहत किसान की जमीन के रकबे और बोई गई फसल के हिसाब से खाद का कोटा तय किया जाता है। यह मॉडल संतुलित उर्वरक उपयोग और बाजार में मजबूत खाद सप्लाई से भी जोड़कर देखा जाता है।
मुख्य सचिवों की बैठक में रखा जाएगा प्रस्ताव
दिसंबर के आखिरी हफ्ते में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव का एक सम्मेलन का आयोजन होगा, जिसमें राज्यों से फ्रेमवर्क फॉर फर्टिलाइजर सेल (एफएफएस) अपनाने की अपील की जाएगी। इस पहल का उद्देश्य वर्तमान में 14 करोड़ से अधिक आधार से जुड़े खरीदारों और 2.5 लाख खुदरा विक्रेताओं वाले इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम को मोबाइल एप आधारित बुकिंग से जोड़ना है।
मोबाइल ऐप और क्यूआर कोड से कैसे मिलेगी खाद?
इस व्यवस्था के तहत किसान या उनके प्रतिनिधि मोबाइल एप पर अपनी जमीन और फसल का ब्योरा दर्ज कर खाद की बुकिंग कर सकते हैं। बुकिंग पक्की होते ही एक क्यूआर-कोड वाला टोकन बनेगा, जो उनके नजदीकी खाद विक्रेता से जुड़ा होगा। जब किसान दुकान पर जाएगा, तो पीओएस मशीन से क्यूआर कोड स्कैन किया जाएगा और आधार से जुड़ी बायोमेट्रिक पहचान के बाद ही खाद दी जाएगी।
कालाबाजारी और गैर-कृषि उपयोग पर नकेल कसने की उम्मीद
नई व्यवस्था से बिना जरूरत के अंधाधुंध खाद खरीदने और खेतों में जरूरत से ज्यादा रसायनों के इस्तेमाल पर रोक लगेगी, जिससे मिट्टी की सेहत सुरक्षित रहेगी। इसके अलावा, सरकारी छूट वाली सस्ती खाद को दूसरे उद्योगों में लगाने, उसकी अवैध बिक्री करने और पड़ोसी देशों में होने वाली तस्करी को पूरी तरह रोकने में मदद मिलेगी।
पायलट प्रोजेक्ट में खाद बिक्री में 28% की कमी
बीते खरीफ सीजन के दौरान केंद्र सरकार ने 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 222 जिलों में नई खाद वितरण मॉडल का परीक्षण कीया था। जानकारों का कहना है कि इस परीक्षण में खाद की बिक्री में 28 प्रतिशत की गिरावट आई है। मध्य प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि प्रदेश में ई-विकास पहल के तहत एग्री स्टैक डेटा का उपयोग करने से खरीफ 2026 में खाद की खपत 36 लाख टन से घटकर 32 लाख टन रह गई, जिससे 764 करोड़ रुपये की सब्सिडी की बचत हुई।
बढ़ती सब्सिडी से खजाने पर भारी दबाव
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार का खाद सब्सिडी खर्च वित्त वर्ष 2021-22 के 1.58 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2022-23 में 2.55 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। इसके बाद यह 2023-24 में 1.95 लाख करोड़ और 2024-25 में 1.77 लाख करोड़ रुपये रहा। हालांकि, वैश्विक कीमतें बढ़ने से वित्त वर्ष 2025-26 में यह 22.6 प्रतिशत उछलकर 2.17 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इस दौरान देश में खाद की कुल बिक्री भी 579.67 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 670.33 लाख मीट्रिक टन हो गई।
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी अंतरराष्ट्रीय कीमतें
चालू वित्त वर्ष में बजट में तय 1.71 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी का 77 प्रतिशत हिस्सा पहले ही खर्च हो चुका है। पश्चिम एशिया संकट और आपूर्ति में आई रुकावटों के कारण मार्च से यूरिया, एलएनजी और डीएपी की वैश्विक कीमतें तेजी से बढ़ीं और मई तक अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी हाल ही में पश्चिम एशिया संकट के बीच ईंधन, खाद और विदेशी मुद्रा से जुड़ी गंभीर आर्थिक चुनौतियों का जिक्र किया था। जानकारों के अनुसार, यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल, अमोनिया और सल्फर के दाम कम नहीं हुए, तो वित्त वर्ष 2026-27 में खाद सब्सिडी की जरूरत 2.5 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच सकती है।