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ऑयल पाम की खेती को मिली रफ्तार : सालाना लक्ष्य का 47% हासिल, रकबा बढ़ाने में जुटी सरकार

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 29 Oct 2026 02:10 PM IST
सार

ऑयल पाम की खेती का रकबा देश में 6.96 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है। पीएम ऑयल पाम मिशन के तहत किसानों को मिलने वाली सहायता, खेती के फायदे और बिहार समेत नए राज्यों में विस्तार की पूरी जानकारी जानें।

पाम ऑयल
पाम ऑयल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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देश में खाद्य तेलों की जरूरत पूरी करने और आयात पर निर्भरता घटाने के लिए सरकार ऑयल पाम की खेती का दायरा बढ़ा रही है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 में अब तक 55,614 हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती का विस्तार किया गया है। यह सालाना लक्ष्य का करीब 47 फीसदी है। सरकार को उम्मीद है कि बिहार के भी राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-ऑयल पाम (NMEO-OP) में शामिल होने से खेती का रकबा बढ़ाने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में पूर्वोत्तर के छह राज्यों अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा में 23,347 हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम का विस्तार हुआ है। वहीं, अन्य नौ राज्यों में 32,267 हेक्टेयर क्षेत्र को इसके तहत लाया गया है। इनमें तेलंगाना में 14,919 हेक्टेयर, आंध्र प्रदेश में 12,652 हेक्टेयर, ओडिशा में 2,119 हेक्टेयर और छत्तीसगढ़ में 1,465 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है।

पांच साल में 6.96 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा रकबा
बिजनेस लाइन की खबर के मुताबिक, राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-ऑयल पाम की शुरुआत अगस्त 2021 में की गई थी। इसका उद्देश्य देश में कच्चे पाम तेल का उत्पादन बढ़ाना और खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम करना है।

मिशन शुरू होने से पहले देश में 3.67 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती होती थी। पिछले पांच वर्षों में 6.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खेती बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन इस दौरान 2.73 लाख हेक्टेयर क्षेत्र ही जोड़ा जा सका। चालू वित्त वर्ष में हुई बढ़ोतरी के बाद देश में ऑयल पाम का कुल रकबा बढ़कर 6.96 लाख हेक्टेयर हो गया है। इसमें से 3.28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र मिशन के तहत जोड़ा गया है।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सबसे आगे
ऑयल पाम की खेती के विस्तार में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना प्रमुख राज्य बने हुए हैं। हालांकि, अब दूसरे राज्यों में भी इसकी खेती बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। गोदरेज एग्रोवेट के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुनील कटारिया के मुताबिक, खेती के लिए उपयुक्त जलवायु वाले क्षेत्रों का चयन और सिंचाई की अच्छी व्यवस्था इस फसल के विस्तार के लिए जरूरी है।

उन्होंने बताया कि ऑयल पाम के ताजे फलों के गुच्छों (FFB) की कीमत वर्ष 2023 में करीब 12,500 रुपये प्रति टन थी, जो अब बढ़कर लगभग 20,000 रुपये प्रति टन हो गई है। इससे किसानों को मिलने वाले दाम और कमाई में सुधार हुआ है।

योजना के बजट का पूरा इस्तेमाल नहीं
ऑयल पाम की खेती बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष में योजना के तहत 757.62 करोड़ रुपये का बजट रखा है। इसमें से राज्यों को 583.23 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। हालांकि, जारी राशि में से अब तक 40 फीसदी से भी कम खर्च हुआ है।

कुछ राज्यों में खर्च की स्थिति बेहतर है। आंध्र प्रदेश, केरल, नागालैंड और मिजोरम ने जारी राशि का 50 फीसदी से अधिक इस्तेमाल किया है। वहीं, गुजरात में जारी राशि का केवल 6 फीसदी, ओडिशा में 15 फीसदी, छत्तीसगढ़ में 22 फीसदी और असम तथा मणिपुर में 24-24 फीसदी खर्च हुआ है।

आंकड़ों के अनुसार, पूर्वोत्तर राज्यों में चालू वित्त वर्ष के लिए निर्धारित 36,319 हेक्टेयर के लक्ष्य में से 23,347 हेक्टेयर क्षेत्र में खेती का विस्तार हो चुका है। यह करीब 64 फीसदी है। दूसरी ओर, अन्य राज्यों में 82,959 हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले 32,267 हेक्टेयर क्षेत्र ही कवर हो पाया है। यह लगभग 39 फीसदी है। बिहार ने भी इस वित्त वर्ष से योजना लागू करने पर सहमति दी है। राज्य में शुरुआती तौर पर 200 हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती का लक्ष्य रखा गया है। इससे आने वाले वर्षों में खेती का दायरा बढ़ने की उम्मीद है।

पूर्वोत्तर के किसानों को प्रति हेक्टेयर एक लाख रुपये की सहायता
सरकार ऑयल पाम की खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को वित्तीय सहायता भी दे रही है। पूर्वोत्तर राज्यों में किसानों को पौध सामग्री, पौधों की देखभाल और जमीन तैयार करने जैसे कामों के लिए प्रति हेक्टेयर एक लाख रुपये की विशेष सहायता दी जाती है।

इस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए जमीन साफ करने, अर्धचंद्राकार मेड़ बनाने और जैविक बाड़ लगाने जैसे कार्यों में भी मदद का प्रावधान है। इसके अलावा, कटाई के औजार खरीदने के लिए किसानों को 2.90 लाख रुपये की सहायता का प्रावधान बताया गया है। योजना के तहत सामान्य राज्यों में केंद्र और राज्य सरकार के बीच खर्च का अनुपात 60:40 है, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों में यह अनुपात 90:10 है।

फसल तैयार होने तक दूसरी फसलों से कमाई का विकल्प
ऑयल पाम की खेती में किसानों के सामने एक बड़ी चुनौती शुरुआती तीन से चार साल का इंतजार है। इस अवधि में पौधों से व्यावसायिक उत्पादन शुरू नहीं होता। ऐसे में किसानों को नियमित आमदनी बनाए रखने के लिए दूसरी फसलें उगाने की जरूरत होती है।

सुनील कटारिया के मुताबिक, छोटे समय में तैयार होने वाली सब्जियों, दलहन और हल्दी जैसी फसलों को ऑयल पाम के पौधों के बीच उगाकर किसान शुरुआती वर्षों में भी कमाई कर सकते हैं। इसे अंतरवर्ती खेती कहा जाता है। इसके साथ ड्रिप सिंचाई, अच्छी गुणवत्ता के पौधे, सस्ता कर्ज और बेहतर कृषि सलाह किसानों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

गोदरेज एग्रोवेट के अनुसार, उसके प्रत्येक 'समाधान' केंद्र के माध्यम से करीब 2,000 हेक्टेयर क्षेत्र के किसानों को कृषि सलाह, खेती में इस्तेमाल होने वाली सामग्री, तकनीकी मार्गदर्शन और बिना संपत्ति गिरवी रखे कर्ज जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं।

24 घंटे में प्रसंस्करण जरूरी
ऑयल पाम की खेती बढ़ाने के साथ प्रसंस्करण इकाइयों और फल संग्रह केंद्रों का विस्तार भी जरूरी है। ताजे फलों के गुच्छों को कटाई के 24 घंटे के भीतर प्रसंस्करण इकाई तक पहुंचाना महत्वपूर्ण होता है। इसलिए खेती के नए क्षेत्र विकसित करने के साथ ग्रामीण सड़कों, परिवहन, संग्रह केंद्रों और प्रसंस्करण सुविधाओं में भी निवेश करना होगा। इससे किसानों की उपज समय पर खरीदी जा सकेगी और तेल उत्पादन की पूरी व्यवस्था मजबूत होगी।

सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है, एक तरफ ऑयल पाम की खेती का क्षेत्र बढ़ाना और दूसरी तरफ राज्यों को योजना की राशि समय पर खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करना। इन दोनों मोर्चों पर प्रगति होने से किसानों को नई फसल का विकल्प मिलने और देश में खाद्य तेल उत्पादन बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
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