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इंग्लैंड में 42 साल की सबसे खराब फसल : सूखे और लू ने तोड़ी किसानों की कमर, भारत के लिए क्यों है ये बड़ा सबक

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Wed, 21 Oct 2026 02:11 PM IST
सार

इंग्लैंड में 2026 में गेहूं, जौ, जई और रेपसीड की कुल पैदावार घटकर 16.03 मिलियन टन रह गई, जो 1984 में रिकॉर्ड शुरू होने के बाद सबसे कम है। ग्रीष्म लहरों और लंबे सूखे ने जौ और जई को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई है। हालात ये हैं कि रेपसीड में 43 प्रतिशत की बढ़त भी कुल गिरावट की भरपाई नहीं कर सकी। खराब फसल ने किसानों की आमदनी, खेती की सहनशीलता और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं बढ़ा दी हैं। जानिए, विस्तार से...

गेहूं, बसंतकालीन जौ और जई पर मौसम की करवट का असर सबसे ज्यादा दिखा।
गेहूं, बसंतकालीन जौ और जई पर मौसम की करवट का असर सबसे ज्यादा दिखा। - फोटो : AI
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विस्तार
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इंग्लैंड के खेतों ने इस साल वह मंजर देखा, जो 1984 में रिकॉर्ड रखना शुरू होने के बाद कभी नहीं दिखा। 2026 में वहां गेहूं, जौ, जई और रेपसीड (सरसों जैसी एक तिलहन फसल) की कुल पैदावार घटकर 16.03 मिलियन टन रह गई। एक मिलियन यानी दस लाख। भीषण गर्मी, लंबे सूखे और असामान्य रूप से सूखे हालात ने फसलों की बढ़वार और उपज, दोनों पर असर डाला।

ब्रिटेन के शोध संगठन एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट के विश्लेषण के मुताबिक यह आंकड़ा पिछले रिकॉर्ड निचले स्तर से भी नीचे है। वह स्तर 2020 में दर्ज हुआ था और 16.16 मिलियन टन था। पर्यावरण, खाद्य और ग्रामीण मामलों के विभाग (डेफ्रा) के अंतरिम आंकड़ों ने किसानों के सामने खड़ी चुनौतियों की यह तस्वीर सामने रखी है।

मई से जुलाई तक तपती परीक्षा
साल की शुरुआत ही सूखी बसंत ऋतु से हुई। इसके बाद मई और जून में एक के बाद एक ग्रीष्म लहरें आईं, और जुलाई इंग्लैंड व वेल्स में बेहद सूखा रहा। नतीजा यह हुआ कि पूरा वेल्स और इंग्लैंड का करीब आधा हिस्सा सूखे की चपेट में आ गया। फसलों को बढ़ने के सबसे अहम दिनों में जितनी नमी चाहिए थी, उतनी नहीं मिल सकी।

सूखी मिट्टी और लगातार तपिश ने फसलों के विकास और दाना बनने की प्रक्रिया को रोक दिया। कुछ किसानों ने सामान्य से पहले कटाई कर ली, तो कुछ ने उपज में भारी कमी की शिकायत की। गेहूं, बसंतकालीन जौ और जई पर यह असर सबसे ज्यादा दिखा।

जौ और जई पर सबसे ज्यादा चोट
डेफ्रा के अंतरिम आंकड़ों के अनुसार जौ का उत्पादन 11 प्रतिशत घटकर 3.7 मिलियन टन रह गया। जई की हालत और बुरी रही। उसका उत्पादन 29 प्रतिशत गिरकर 5,27,000 टन पर आ गया, जो पिछले 14 साल का सबसे निचला स्तर है।

कृषि एवं बागवानी विकास बोर्ड (एएचडीबी) के आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं। शीतकालीन गेहूं की औसत उपज 6.9 टन प्रति हेक्टेयर रही, जो पांच साल के औसत से 11 प्रतिशत कम है। बसंतकालीन जौ की उपज 4.8 टन प्रति हेक्टेयर रही, जो पांच साल के औसत से 17 प्रतिशत कम है। वहीं, जई की उपज 4.6 टन प्रति हेक्टेयर रही, यानी 14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 

गेहूं टिका, रेपसीड ने दिया सहारा
इस मायूसी के बीच गेहूं का उत्पादन थोड़ा बढ़कर 10.8 मिलियन टन रहा, हालांकि उसकी उपज लंबे समय के औसत से कम ही रही। रेपसीड गिनी-चुनी फसलों में रही, जिसमें सुधार दिखा। उसका उत्पादन 43 प्रतिशत बढ़कर करीब एक मिलियन टन हो गया। इसकी वजह ज्यादा रकबे में बुवाई और बेहतर उपज रही। फिर भी यह बढ़त अनाज की कुल गिरावट की भरपाई के लिए काफी नहीं थी।

देश भर में नतीजे एक जैसे नहीं रहे। उत्तरी इलाकों का प्रदर्शन दक्षिणी इलाकों से बेहतर रहा। वहीं, यॉर्कशायर और द हम्बर में गेहूं का उत्पादन बढ़ा, जबकि दक्षिण के कई क्षेत्रों में गिरावट दर्ज हुई।

किसानों की मुश्किल बढ़ी, जेब पर बढ़ा बोझ
खराब फसल ने उन किसानों की मुश्किल और बढ़ा दी है, जो पहले से ऊंची उत्पादन लागत से जूझ रहे थे। कम उपज और घटती अनाज गुणवत्ता से बाजार में बिकने लायक माल घट सकता है। भंडारण और बिक्री भी पेचीदा हो सकती है, और इसका असर किसानों की आमदनी और खेती की आपूर्ति शृंखलाओं पर पड़ेगा। इसी वजह से किसानों की आय, खेती की सहनशीलता और ब्रिटेन की खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएं गहरा गई हैं।

खेती को बदलते मौसम के अनुकूल ढालना होगा 
इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि खेती को चरम मौसम का सामना करने लायक बनाना होगा। मिट्टी में नमी रोकने की क्षमता सुधारना, जल भंडारण और सिंचाई में निवेश, सूखा सहने वाली फसल किस्में विकसित करना और कृषि अनुसंधान का विस्तार इसमें मदद कर सकते हैं। 

सरकारी सहायता से ऐसे उपाय किसानों के लिए सस्ते हो सकते हैं, और दीर्घकालिक योजना व बेहतर जल प्रबंधन से घरेलू उत्पादन मजबूत हो सकता है और ग्रामीण आजीविका पर जोखिम घट सकता है। वर्ष 2026 की यह फसल इंग्लैंड की खेती के सामने खड़ी चुनौती का आईना है, जहां किसान लगातार अनिश्चित होते मौसम के बीच उत्पादन बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

इंग्लैंड के इन अनुभवों से भारत सहित पूरी  दुनिया को सबक लेने की जरूरत है ताकि समय रहते जलवायु परिवर्तन के अनुरूप अपनी खेती को ढाला जा सके। 
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