अगर खेत में खड़ी फसल की पत्तियां ही किसान को बता दें कि उस पर कीटों या बीमारी का हमला होने वाला है, तो नुकसान होने से पहले ही बचाव करना संभव हो सकता है। अब खेती में इसी कल्पना को हकीकत बनाने की कोशिश हो रही है। वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं, जिनसे पौधे बीमारी या कीटों के हमले पर अपनी चमक, पत्तियों के रंग या हवा में छोड़े जाने वाले खास रसायनों के जरिए संकेत दे सकेंगे।
इन संकेतों को कैमरों और सेंसर की मदद से पहचानकर किसान समय रहते फसल की जरूरत समझ सकेंगे। इससे न सिर्फ फसल को बचाने में मदद मिल सकती है, बल्कि कीटनाशकों के अनावश्यक छिड़काव और खेती की लागत को भी कम किया जा सकता है।
डीएनए में बदलाव कर पौधों को बनाया जा रहा संकेत देने वाला
अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित स्टार्टअप इनरप्लांट (InnerPlant) इस दिशा में काम कर रहा है। कंपनी पौधों के डीएनए में बदलाव करके उनमें ऐसे गुण विकसित कर रही है, जिनसे बीमारी या कीटों के हमले की स्थिति में खास संकेत पैदा हो सकें।
कंपनी की सीईओ शेली एरोनोव के मुताबिक, जब किसी पौधे पर हमला होता है, तो वह अपनी सुरक्षा के लिए कुछ जीन सक्रिय करता है। अलग-अलग तरह के हमलों पर पौधे की प्रतिक्रिया भी अलग हो सकती है। कंपनी इसी प्राकृतिक प्रक्रिया का इस्तेमाल करके पौधों में ऐसे संकेत विकसित करने पर काम कर रही है, जिन्हें तकनीक की मदद से पहचाना जा सके।
कैसे काम करेगी यह तकनीक?
इस तकनीक में पौधों के अंदर ऐसे गुण विकसित किए जाते हैं, जिनसे बीमारी या फफूंद के हमले जैसी स्थिति में खास प्रोटीन बनने लगते हैं। इन प्रोटीन से प्रकाश का ऐसा संकेत पैदा हो सकता है, जिसे सामान्य आंखों से देख पाना संभव नहीं होता।
ऐसे संकेतों को पहचानने के लिए विशेष कैमरों की जरूरत होगी। खेतों में लगे कैमरों, कैमरे वाले ट्रैक्टर, ड्रोन और सैटेलाइट की मदद से फसलों की निगरानी की जा सकती है। इससे खेत के उन हिस्सों का पता लगाने में मदद मिल सकती है, जहां पौधे परेशानी के शुरुआती संकेत दे रहे हों। कंपनी के अनुसार, पौधों में विकसित किए गए ये गुण बीजों के जरिए अगली पीढ़ी तक भी पहुंच सकते हैं।
मक्के की पत्तियां बैंगनी होकर देंगी चेतावनी
अमेरिका का स्टार्टअप इनसाइगनम एगटेक (Insignum AgTech) भी ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है। कंपनी ने मक्के की ऐसी खास फसल विकसित की है, जिसकी पत्तियां फफूंद से होने वाली बीमारी या कीटों के हमले की स्थिति में बैंगनी रंग की हो सकती हैं। इसके लिए पौधे के डीएनए में पहले से मौजूद कुछ गुणों को जीन एडिटिंग के जरिए सक्रिय किया जाता है, ताकि पौधा बीमारी के शुरुआती चरण में ही प्रतिक्रिया दे सके।
कंपनी के मुताबिक, ऐसे पौधे बीमारी शुरू होने के कुछ मिनटों के भीतर रंग बदलना शुरू कर सकते हैं। आमतौर पर किसानों को फसल में बीमारी का पता चलने में करीब दो हफ्ते लग सकते हैं। अगर शुरुआती संकेतों की पहचान समय रहते हो जाए, तो किसान नुकसान बढ़ने से पहले कदम उठा सकते हैं।
हवा में मौजूद रसायनों से पौधों की परेशानी पहचानेंगे सेंसर
ब्रिटेन का स्टार्टअप विरिडिक्स बायो (Viridix Bio) पौधों के डीएनए में बदलाव करने के बजाय जैविक सेंसर विकसित कर रहा है। ये सेंसर हवा में पौधों से निकलने वाले खास अणुओं की पहचान करके उनकी स्थिति के बारे में जानकारी देने के लिए तैयार किए जा रहे हैं।
कंपनी के सह-संस्थापक स्टुअर्ट डिक्सन के मुताबिक, जब एफिड जैसे छोटे कीट पौधों की पत्तियों को खाते हैं, तो पौधे हवा में कुछ खास रसायन छोड़ सकते हैं। कंपनी ऐसे प्राकृतिक संकेतों को पहचानकर उन्हें किसानों के काम की जानकारी में बदलना चाहती है। इस तरीके में पौधे के रंग या चमक को देखने के बजाय हवा में मौजूद रासायनिक संकेतों का पता लगाया जाएगा। इससे फसल में होने वाले बदलावों की पहचान करने का एक और तरीका मिल सकता है।
किसानों को क्या होगा फायदा?
अगर ये तकनीकें खेतों में भरोसेमंद तरीके से काम करने लगती हैं, तो किसानों को कई फायदे हो सकते हैं।
समय रहते बीमारी का पता: फसल में परेशानी के शुरुआती संकेत मिलने से किसान समय पर कदम उठा सकेंगे।
कीटनाशकों का सीमित इस्तेमाल: पूरे खेत में छिड़काव करने के बजाय प्रभावित हिस्सों पर ध्यान देना संभव हो सकता है।
खेती की लागत में कमी: जरूरत के मुताबिक कीटनाशकों और दूसरे कृषि उत्पादों का इस्तेमाल करने से खर्च घट सकता है।
मिट्टी और पानी की सुरक्षा: रसायनों का अनावश्यक इस्तेमाल कम होने से मिट्टी और जलस्रोतों में प्रदूषण घटाने में मदद मिल सकती है।
फसल बचाने में मदद: समय रहते बीमारी या कीटों की पहचान होने से फसल को होने वाले नुकसान को कम करने की संभावना बढ़ सकती है।
जलवायु परिवर्तन के कारण खेती में मौसम और फसलों से जुड़ी चुनौतियां बढ़ रही हैं। ऐसे में फसलों की लगातार निगरानी करने वाली तकनीक किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
तकनीक के सामने अभी कई चुनौतियां
हालांकि, पौधों के जरिए बीमारी का शुरुआती संकेत देने वाली ये तकनीकें अभी विकास और परीक्षण के चरण में हैं। इन्हें बड़े पैमाने पर अपनाने से पहले इनकी सटीकता, लागत और अलग-अलग मौसम व खेती की परिस्थितियों में काम करने की क्षमता को परखना होगा।
जीन एडिटिंग से विकसित फसलों को लेकर नियम भी एक बड़ी चुनौती हैं। यूरोपीय संघ जैसे कुछ बाजारों में जीन एडिटिंग वाली फसलों पर सख्त नियम लागू हैं। इसके अलावा, नई तकनीक के लिए विशेष कैमरों, सेंसर और निगरानी व्यवस्था की जरूरत किसानों का खर्च बढ़ा सकती है। इसलिए इन तकनीकों का वास्तविक फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि ये कितनी सटीक जानकारी देती हैं, किसानों के लिए कितनी किफायती साबित होती हैं और इन्हें खेतों में कितनी आसानी से अपनाया जा सकता है।
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