उत्तर प्रदेश अब खेती में एक बड़ी छलांग की तैयारी में है। विश्व बैंक की मदद से चल रही उत्तर प्रदेश कृषि विकास एवं ग्रामीण उद्यम पारिस्थितिकी सुदृढ़ीकरण परियोजना, यानी यूपी-एग्रीस का मकसद उत्पादकता बढ़ाना, किसान की आमदनी बढ़ाना, जलवायु की मार झेलने की ताकत देना और बाजार से रिश्ता मजबूत करना है। इसके तहत पूर्वी उत्तर प्रदेश के 21 जिलों और बुंदेलखंड के सात जिलों में खेती का एक नया तंत्र खड़ा किया जाएगा।
बीते कई दशकों तक खेती की कामयाबी अक्सर अनाज के बढ़ते उत्पादन से नापी जाती रही। मगर, खेती की लागत घटाना, फसल के वाजिब दाम दिलाना, मूल्य संवर्धन को मजबूत करना और किसान की आमदनी बढ़ाना जैसे अहम सवालों पर उतना ध्यान नहीं गया। यूपी-एग्रीस खेत को तकनीक, बाजार, प्रसंस्करण, उद्यमिता और वैश्विक मूल्य शृंखला से जोड़ने वाला एकीकृत तंत्र बनाने पर केंद्रित है।
नई साझेदारियों से मिली रफ्तार
इस पहल को हाल ही में नई गति मिली, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश डायवर्सिफाइड एग्रीकल्चर सपोर्ट प्रोजेक्ट (यूपीडीएएसपी) ने गूगल और नेटवर्क फॉर ह्यूमैनिटी, आईटीसी तथा एक्वाब्रिज के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए। इन साझेदारियों में तकनीक, डिजिटल ढांचा, जलवायु अनुकूल खेती, बाजार तंत्र, मत्स्य पालन और निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता एक साझा लक्ष्य के लिए साथ आई है, और वह लक्ष्य है किसान की समृद्धि।
मुख्यमंत्री ने इन समझौतों को कृषि उत्पादकता और किसान की आय को नई दिशा देने की प्रतिबद्धता बताया। उनके अनुसार यूपी-एग्रीस खेती को केवल उत्पादन बढ़ाने के पारंपरिक लक्ष्य से आगे ले जाने के लिए बनी है। बड़ा उद्देश्य किसान को महज उत्पादक से आधुनिक कृषि परिदृश्य का सक्रिय भागीदार बनाना है।
28 जिले, 123 विकास खंड, 10 लाख किसान
करीब 4,000 करोड़ रुपये की यह परियोजना खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड पर केंद्रित है, यानी ऐसे दो इलाकों पर जिनमें खेती की भारी संभावना है, पर जो विकास और उत्पादकता की चुनौतियों से जूझते रहे हैं। यह 28 जिलों के 123 विकास खंडों में लागू हो रही है और इसका लक्ष्य करीब 10 लाख किसानों, 35,000 मत्स्य उत्पादक किसानों और लगभग तीन लाख महिलाओं को फायदा पहुंचाना है। यह करीब छह लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करेगी।
अमल की तस्वीर दिखने लगी है। खरीफ 2026 में करीब 1.75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र परियोजना के दायरे में लाया गया है। रबी 2026-27 के लिए भी ऐसा ही लक्ष्य रखा गया है, जिसमें गेहूं, मटर, चना, मसूर और सरसों जैसी अहम फसलों की उत्पादकता सुधारने पर जोर है।
इन 6 गेमचेंजर सूत्रों से बदलेगी खेती
यूपी-एग्रीस के केंद्र में मुख्यमंत्री की बताई सरल पर व्यापक सोच है, यानी उत्पादकता, तकनीक, जलवायु सहनशीलता, बाजार, उद्यम और किसान समृद्धि। ये छह तत्व मिलकर पारंपरिक खेती से हटकर ज्यादा विविध, तकनीक आधारित और बाजारोन्मुख मॉडल की ओर बढ़ने का संकेत देते हैं।
वैज्ञानिक और जलवायु अनुकूल खेती
परियोजना का एक बड़ा हिस्सा वैज्ञानिक और जलवायु के अनुकूल खेती के तरीके अपनाना है। अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (इरी) के साथ मिलकर आधुनिक कृषि तकनीकें सीधे किसानों के खेतों तक पहुंचाई जा रही हैं। खरीफ 2026 में 3,000 हेक्टेयर में धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) का प्रयोग हो रहा है। धान के अलावा कार्ययोजना में मक्का, बाजरा, ज्वार, अरहर, तिल, उड़द और मूंगफली भी शामिल हैं।
मकसद सिर्फ नई फसल या तकनीक लाना नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की समृद्ध कृषि परंपरा को वैश्विक वैज्ञानिक ज्ञान से जोड़ना है। जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी और बढ़ती लागत ने ऐसे हस्तक्षेपों को और जरूरी बना दिया है। वैज्ञानिक खेती से किसान कम संसाधन में बेहतर उपज ले सकते हैं।
एक एप पर मिलेंगी सारी सेवाएं
डिजिटल तकनीक बदलाव का दूसरा अहम स्तंभ है। गूगल और नेटवर्क फॉर ह्यूमैनिटी के साथ साझेदारी में राज्य एक ओपन नेटवर्क फॉर एग्रीकल्चर विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। प्रस्तावित मंच यूपीआई और ओएनडीसी जैसे सफल खुले डिजिटल ढांचों से प्रेरित है।
सोच यही है कि किसानों को कई एप और विभिन्न मंचों से जूझने की उलझन से बचाया जाए। एकीकृत डिजिटल तंत्र में किसान मौसम, बाजार भाव, मिट्टी की जानकारी, कृषि सलाह और दूसरे एग्रीटेक समाधान एक ही जगह से पा सकेंगे। साथ ही एग्रीटेक स्टार्टअप और निजी कंपनियों को भी किसानों के बड़े नेटवर्क तक अपनी सेवाएं पहुंचाने का मौका मिलेगा। मौसम, बाजार की चाल और खेती के तौर-तरीकों की समय पर जानकारी से किसान बेहतर फैसले ले सकेंगे, फिजूलखर्ची घटा सकेंगे और मुनाफा बढ़ा सकेंगे।
बहराइच में धान का आदर्श क्लस्टर
जलवायु अनुकूल खेती भी बड़ा केंद्र बिंदु है। आईटीसी के साथ साझेदारी में यूपी-एग्रीस धान और गेहूं के जलवायु सहनशील कमोडिटी क्लस्टर विकसित करना चाहती है। दो लाख एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियां फैलाने का प्रस्ताव है, जिनमें जीरो टिलेज, धान की सीधी बुवाई, जलवायु सहनशील उन्नत बीज और निर्णय आधारित पोषक तत्व प्रबंधन शामिल हैं।
एक खास प्रस्ताव बहराइच में 1,500 एकड़ का धान क्लस्टर बनाने का है, जो गुणवत्ता और अवशेष मानकों, यानी एमआरएल जरूरतों के अनुरूप होगा। लक्ष्य प्रति एकड़ किसान की आमदनी में 20 से 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी, यूरिया की खपत में 25 प्रतिशत की कटौती और श्रम व सिंचाई में 25 से 30 प्रतिशत की बचत है।
यह तरीका कृषि नीति में एक अहम बदलाव दर्शाता है, यानी सिर्फ मात्रा से हटकर गुणवत्ता, टिकाऊपन और बाजार की प्रतिस्पर्धा की ओर कदम। किसानों को ऐसे उत्पादन मानकों से जोड़ा जा रहा है, जो घरेलू और निर्यात के बेहतर दाम वाले बाजारों तक पहुंच दिला सकें।
खेत से बाजार तक की कड़ी
बाजार से जुड़ाव और मूल्य शृंखला का विकास भी रणनीति के केंद्र में है। धान, गेहूं, मिर्च, मक्का, हरी मटर और टमाटर जैसी फसलों के लिए प्रमुख निजी कंपनियों के साथ साझेदारियां बन रही हैं। उम्मीद है कि ये उत्पादन, संग्रह, भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार पहुंच को मजबूती देंगी। इरादा यह है कि कृषि उपज खेत या पारंपरिक मंडी तक ही सीमित न रहे। मूल्य शृंखला की हर कड़ी मजबूत होने से किसान को बेहतर खरीद व्यवस्था, मूल्य संवर्धन और नए बाजार मिल सकते हैं।
नीली अर्थव्यवस्था और मत्स्य उद्यम
परियोजना मत्स्य पालन और उभरती नीली अर्थव्यवस्था पर भी खास ध्यान देती है। एक्वाब्रिज के साथ साझेदारी में उत्तर प्रदेश मछली पालन को काफी हद तक पारंपरिक गतिविधि से तकनीक आधारित उद्यम में बदलना चाहता है। मछली पालक किसान, सहकारी समितियां और उद्यमी आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों से जुड़ेंगे।
एआई आधारित मत्स्य प्रबंधन और स्वचालित आहार प्रणालियों पर विशेष जोर प्रस्तावित है। उन्नाव में आईएमसी औद्योगिक गलियारे के तहत 60 एकड़ में एकीकृत मत्स्य परियोजना भी विकसित हो रही है। प्रस्तावित तंत्र में हैचरी, चारा निर्माण इकाई, प्रसंस्करण सुविधा और समर्पित प्रशिक्षण केंद्र शामिल हैं।
प्रसंस्करण और निर्यात की ओर
यूपी-एग्रीस प्राथमिक उत्पादन से आगे खाद्य प्रसंस्करण और निर्यात की ओर भी देख रही है। नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास मेगा फूड पार्क और एग्री एक्सपोर्ट सेंटर प्रस्तावित है, जिसका मकसद उत्तर प्रदेश की कृषि उपज को प्रसंस्करण, लॉजिस्टिक्स, मूल्य संवर्धन और वैश्विक बाजारों से जोड़ना है।
इक्कीसवीं सदी की खेती की तैयारी
यूपी-एग्रीस की बड़ी अहमियत यह है कि वह उत्तर प्रदेश की खेती को 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने की कोशिश है। आज खेती केवल मिट्टी और मौसम से नहीं चलती। डेटा विज्ञान, डिजिटल मंच, जलवायु संबंधी जानकारी, वैज्ञानिक शोध, आपूर्ति शृंखलाएं और बाजार की सूचना भी उतने ही जरूरी होते जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री की सोच है कि किसान को कृषि नवाचार की इस नई अर्थव्यवस्था का सक्रिय साझेदार बनाया जाए। अगर खेत डिजिटल हों, खेती जलवायु के अनुकूल बने, उत्पादन गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरे और बाजार का दायरा बढ़े, तो फायदे फसल की ज्यादा पैदावार से कहीं आगे जा सकते हैं।
पिछड़ेपन की छवि बदलने की ओर कदम
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड के लिए यह परियोजना खास मायने रखती है। जो इलाके कभी मुख्यतः पिछड़ेपन और विकास की चुनौतियों से जुड़े माने जाते थे, उन्हें अब कृषि रूपांतरण की नई रणनीति के केंद्र में रखा जा रहा है। सरकारी संस्थाओं, वैश्विक विकास एजेंसियों, तकनीकी कंपनियों, शोध संगठनों और निजी उद्यमों को साथ लाकर यूपी-एग्रीस ज्यादा सशक्त और समृद्ध ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनाना चाहती है।
लखनऊ में हुए ये समझौते इसलिए सिर्फ संस्थागत साझेदारियां नहीं हैं। ये खेती को उत्पादकता से समृद्धि तक ले जाने की रूपरेखा हैं। अगर इन्हें प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो ऐसा मॉडल बन सकता है, जिसमें बेहतर तकनीक, टिकाऊ खेती, मजबूत बाजार, ग्रामीण उद्यम और किसान की आमदनी एक-दूसरे को ताकत दें।
इस पहल का लक्ष्य साफ है कि उत्तर प्रदेश का किसान सिर्फ फसल उगाने वाला न रहे, बल्कि आधुनिक, प्रतिस्पर्धी और नवाचार संचालित कृषि अर्थव्यवस्था में समृद्धि का साझेदार बनकर उभरे।