महाराष्ट्र में गन्ने की कम उपलब्धता से चीनी मिलों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। राज्य में अनियमित बारिश और सूखे जैसे हालात के कारण 2026-27 के पेराई सीजन में गन्ने की पेराई घटकर करीब 900 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। पिछले सीजन में करीब 1,045 लाख मीट्रिक टन गन्ने की पेराई हुई थी। इससे राज्य के चीनी उत्पादन में भी करीब 10 लाख मीट्रिक टन की कमी आने की आशंका है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र के कृषि विभाग और विशेषज्ञ समिति ने गन्ने की उपलब्धता के आधार पर यह अनुमान जताया है। राज्य के चीनी आयुक्त डॉ. संजय कोलते के अनुसार, इस सीजन में महाराष्ट्र में करीब 89 से 90 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन हो सकता है। पिछले सीजन में राज्य ने 99 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन किया था।
104 दिन के बजाय 90 दिन चल सकता है पेराई सीजन
गन्ने की कमी का असर चीनी मिलों के कामकाज पर भी पड़ने की आशंका है। अनुमान है कि इस बार महाराष्ट्र में पेराई सीजन की औसत अवधि घटकर करीब 90 दिन रह सकती है। पिछले साल यह अवधि लगभग 104 दिन थी।
पेराई के दिनों और गन्ने की मात्रा में कमी से मिलों की उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना मुश्किल हो सकता है। इससे उनकी कमाई पर भी असर पड़ने की आशंका है। पिछले सीजन में राज्य की 210 चीनी मिलों ने गन्ने की पेराई की थी। आगामी सीजन के लिए अब तक 103 मिलों को लाइसेंस मिल चुका है, जबकि 109 अन्य मिलों को लाइसेंस देने की प्रक्रिया जारी है।
इथेनॉल उत्पादन में 30 फीसदी गिरावट का अनुमान
महाराष्ट्र में इथेनॉल उत्पादन भी करीब 30 फीसदी घटने का अनुमान है। राज्य की चीनी मिलों ने इथेनॉल बनाने के लिए डिस्टिलरी यानी आसवन इकाइयों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। इन इकाइयों की कुल स्थापित इथेनॉल उत्पादन क्षमता करीब 296 करोड़ लीटर बताई गई है।
हालांकि, वास्तविक उत्पादन और बिक्री कई बातों पर निर्भर करती है। इनमें गन्ने और दूसरे कच्चे माल की उपलब्धता, सरकार की खरीद नीति और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) की मांग शामिल हैं। देश में तेल कंपनियों की इथेनॉल की मांग करीब 1,100 करोड़ लीटर आंकी गई है। इसमें महाराष्ट्र की हिस्सेदारी लगभग 100 से 120 करोड़ लीटर है।
इथेनॉल बनाने के लिए कच्चे माल पर पाबंदियां भी चुनौती
चीनी मिलें हर साल अपने कुल चीनी उत्पादन का करीब 9 फीसदी हिस्सा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल करती हैं। लेकिन केंद्र सरकार की मौजूदा खरीद नीति के तहत गन्ने के रस, सिरप और बी-हैवी शीरे से बने इथेनॉल की खरीद पर लगी पाबंदियों से मिलों के सामने मुश्किलें बढ़ सकती हैं। ऐसे में मिलों को इथेनॉल बनाने के लिए सी-हैवी शीरे और अनाज से तैयार होने वाले कच्चे माल पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है।
मिलों के निवेश पर पड़ सकता है असर
गन्ने की कम उपलब्धता और इथेनॉल खरीद से जुड़ी पाबंदियां एक साथ चीनी उद्योग पर दबाव बढ़ा सकती हैं। इससे डिस्टिलरी इकाइयों का संचालन प्रभावित होने और पहले किए गए निवेश से अपेक्षित कमाई नहीं होने का खतरा है। आने वाले सीजन में गन्ने की उपलब्धता, सरकारी खरीद नीति और इथेनॉल की मांग यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि महाराष्ट्र की चीनी मिलें अपनी उत्पादन क्षमता का कितना इस्तेमाल कर पाती हैं।
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