राजस्थान में इस साल कमजोर मानसून के कारण रबी की फसलों पर गहरा संकट मंडरा रहा है। बारिश कम होने से तालाबों और जलस्रोतों में पानी पर्याप्त नहीं है। इस संभावित नुकसान से किसानों को बचाने के लिए प्रशासन ने एक मिटिगेशन ड्राफ्ट प्लान तैयार किया है। अकेले उदयपुर जिले में गेहूं की बुवाई आमतौर पर 90 हजार हेक्टेयर में होती है, लेकिन पानी की कमी के कारण इस बार इसमें 50 प्रतिशत तक की गिरावट आने की आशंका है।
कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों पर जोर
सरकार की योजना के तहत किसानों को गेहूं की जगह सरसों, चना, तारामीरा और जौ बोने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। गेहूं की फसल पकने में 6 बार पानी देना पड़ता है, जबकि सरसों और चना जैसी फसलें केवल 2 सिंचाई में तैयार हो जाती हैं। जो किसान गेहूं ही बोना चाहते हैं, उन्हें कम समय में पकने वाले बीज इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। गेहूं की कुछ नई किस्में 90 से 110 दिन में, और सिर्फ दो सिंचाई में तैयार हो जाती हैं।
पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था
बारिश कम होने से केवल अनाज ही नहीं, बल्कि पशुओं के चारे की भी कमी हो सकती है। इसे देखते हुए किसानों को जई, ज्वार और नेपियर घास उगाने की सलाह दी जा रही है। चारे का रकबा बढ़ाकर पशुपालकों को नुकसान से बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
आधुनिक सिंचाई और तलाई बनाने पर अनुदान
खेतों में खुली सिंचाई (क्यारियां बनाकर पानी देना) करने से पानी बहुत बर्बाद होता है। इसे रोकने के लिए ड्रिप सिंचाई और फव्वारा (स्प्रिंकलर) प्रणाली लगाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा, खेतों में बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए 'तलाई' (खेत तालाब) बनाने को बढ़ावा दिया जा रहा है। योजना के अनुसार, किसानों को खेत में तलाई बनाने के लिए सरकार की ओर से 52,000 रुपये की सब्सिडी दी जाएगी।