गांव की गोशाला गोबर और गोमूत्र से जैविक उत्पादन बनाकर आत्मनिर्भर बनने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को रफ्तार दे सकती है। MP के कटनी जिले की पठकरा पंचायत में बजरंग गोशाला ने यह मॉडल पेश किया है। इस गोशाला में वर्मी कंपोस्ट, जीवामृत, बायोगैस और एजोला जैसे उत्पादन बनाये जाते हैं, जिससे पिछले साल 1.5 लाख रुपये से ज्यादा की आमदनी हुई है।
गोशाला से किसानों और गांवों को फायदा
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गोशाला का योगदार केवल उसकी कमाई तक सीमित नहीं रहता। गोशाला में बनने वाली जैविक खाद सीधे किसानों को फायदा देते हैं। वहीं, बायोगैस आत्मनिर्भर गांव की विसात बिछाती है। इस गोशाला को संभालने वाली समिति का अगला लक्ष्य भी जैविक उत्पादन को और बढ़ाना है। इसका मकसद किसानों को कम दाम में अच्छी जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक उपलब्ध कराना है। आय बढ़ने से गायों के इलाज और दूसरी सुविधाओं में भी विस्तार किया जाएगा।
400 गायों का घर, गोशाला की पूरा यात्रा
यह गोशाला जनवरी 2022 में एक स्थानीय समूह द्वारा शुरू की गई थी। बाद में जुलाई 2025 में इसकी पूरी जिम्मेदारी मानव जीवन विकास समिति को दे दी गई। समिति के सचिव निर्भय सिंह के अनुसार, यहां सड़कों पर घूमने वाली बेसहारा गायों को सरपंच के पत्र के माध्यम से लाया जाता है। कई ग्रामीण भी अपनी गाएं दान में देते हैं। इस समय गोशाला में करीब 400 गायों की देखभाल हो रही है और तीन कर्मचारी नियमित रूप से यहां काम करते हैं।
हर गाय पर सरकार से रोजाना 40 रुपये की मदद
गोशाला को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार की तरफ से प्रति गाय 40 रुपये रोजाना का अनुदान दिया जाता है। समिति के सदस्य ओम प्रकाश यादव ने बताया कि जैविक उत्पादों से जो 1.5 लाख रुपये की कमाई हुई है, उसे गोशाला के रखरखाव और गायों के चारे-पानी पर खर्च किया जा रहा है। सरकारी मदद और खुद की कमाई से गोशाला का संचालन बेहतरीन तरीके से हो रहा है।