भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत काम करने वाले भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील (AMNS) के बीच एक लंबी अवधि का समझौता पक्का हुआ है। यह समझौता साल 2029 तक चलेगा। संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. भूपिंदर सिंह के अनुसार, अब लोहे की खदानों से निकलने वाले आयरन ओर टेलिंग्स को केवल कचरा नहीं माना जाएगा। इसे मूल्यवान उत्पादों में बदलकर खेती के लिए उपयोगी बनाया जा रहा है, जिससे पर्यावरण को नुकसान भी कम होगा और किसानों को भी फायदा मिलेगा।
शुरुआती परीक्षणों में मिली बड़ी सफलता
साल 2024 से चल रहे शुरुआती अध्ययनों के बहुत ही उत्साहजनक नतीजे सामने आए हैं। परीक्षण के दौरान खदान के इस कचरे का इस्तेमाल धान, गेहूं, बैंगन और भिंडी जैसी फसलों पर किया गया। डॉ. सिंह के अनुसार, इन फसलों की पैदावार में 10 से 15 प्रतिशत का सुधार दर्ज किया गया। इसके साथ ही, खेतों में डाले जाने वाले रासायनिक उर्वरकों (खाद) के इस्तेमाल में भी 20 प्रतिशत की कमी आई।
कचरा पूरी तरह से सुरक्षित और पोषक तत्वों से भरपूर
खदान के कचरे को सीधे खेतों में नहीं डाला जा सकता, क्योंकि इससे मिट्टी में लोहे की मात्रा जरूरत से ज्यादा हो सकती है। डॉ. सिंह ने बताया कि उनकी टीम ने अलग-अलग समय पर मिले कचरे के छह बैचों की गहन जांच की है। जांच में यह पूरी तरह से साबित हुआ है कि इनमें कोई भी जहरीली भारी धातु (टॉक्सिक हेवी मेटल) नहीं है। यह कचरा लोहा, कैल्शियम, मैग्नीशियम और पौधों के लिए जरूरी कई अन्य तत्वों से भरपूर है। कचरे में मौजूद पोषक तत्वों को पौधों के लिए घुलनशील बनाने के लिए विशेष प्रकार के बैक्टीरिया और फंगस के जैविक मिश्रण का उपयोग किया जाता है।
फसलों की पोषण क्षमता और मिट्टी के सुधार पर जोर
देश की लगभग 12 प्रतिशत खेती योग्य भूमि में लोहे की और 49 प्रतिशत मिट्टी में जिंक की भारी कमी है। इस नई परियोजना का एक बड़ा लक्ष्य फसलों में लोहे और जिंक की मात्रा को बढ़ाना है, ताकि इंसानों के आहार में भी पोषण की कमी को दूर किया जा सके। डॉ. सिंह के अनुसार, परियोजना के दूसरे चरण में अनाज, तिलहन, आलू जैसी कंद वाली फसलों, सब्जियों और गैर-खाद्य फूलों पर भी काम किया जाएगा। इसके अलावा, मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाए बिना इसे कृषि-वानिकी (एग्रोफॉरेस्ट्री) में आजमाने की भी योजना है।
नवंबर से शुरू होंगे बड़े पैमाने पर परीक्षण
इस लंबी साझेदारी के तहत नवंबर महीने से आईसीएआर-आईएआरआई के खेतों में बड़े पैमाने पर परीक्षण शुरू हो जाएंगे। डॉ. सिंह ने जानकारी दी कि इसके अलावा छत्तीसगढ़ में भी खेतों में परीक्षण किए जाएंगे। चूंकि छत्तीसगढ़ एक जैविक खेती वाला राज्य है, इसलिए वहां के परीक्षणों में इस कचरे को पूरी तरह से जैविक तरीके से सुधारा जाएगा और किसी भी तरह के रासायनिक पदार्थ के इस्तेमाल से बचा जाएगा।