यूपी के सोनभद्र जिले से पर्यावरण को बचाने का एक बेहतरीन तरीका सामने आया है। जानकारी के अनुसार, जिले के आदिवासी समुदाय के लोग पर्यावरण रक्षक बनकर जंगलों को बचाने में जुटे हैं। बीते 15 सालों से चालू इस पहल के तहत 38 अलग-अलग गांवों के 3500 से ज्यादा ग्रामीण जुड़ चुके हैं। कुल मिलाकर ग्रामीणों ने 2070 हेक्टेयर जंगल को सुरक्षित करने का काम किया है।
निगरानी का तरीका और ग्रामीणों की मुस्तैदी
इस पहले के तहत जंगलों में पेड़ों की अवैध कटाई को रोकने के लिए ग्रामीणों ने एक व्यवस्था बनाई है, जिसके तहत वन विभाग के वाचरके साथ तीन-तीन ग्रामीण शिफ्ट के हिसाब से जंगलों में पहरा देते हैं। इसके अलावा, जंगल में जाने वाले चरवाहे भी किसी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत प्रहरियों को देते हैं।
जंगल के रास्तों पर बैरियर भी लगाए गए हैं। अगर कहीं अवैध कटाई की जानकारी मिलती है, तो ग्रामीण तुरंत मौके पर पहुंचकर पेड़ काटने वालों को कुल्हाड़ी छोड़ने की हिदायत देते हैं। ग्रामीणों के इस कदम ने पेड़ों की अवैध कटाई पर लगाम लगाने में अहम भूमिका निभाई है।
कर्री गांव की सफलता और पहाड़ियों पर लौटती हरियाली
जानकारी के अनुसार, दुद्धी ब्लॉक के कर्री गांव में लगभग 300 परिवार रहते हैं, जिनमें से 80 परिवार सीधे तौर पर वन संरक्षण के काम से जुड़े हुए हैं। ग्राम स्वराज समिति की तरफ से साल 2011 में महज 20 हेक्टेयर जंगल से जो मुहिम शुरू की गई थी, उसका दायरा अब बढ़कर 185 हेक्टेयर तक पहुंच गया है।
ग्रामीणों की इस मेहनत से वीरान हो चुकी पहाड़ियों पर फिर से हरियाली लौटने लगी है। जंगल बचने से ग्रामीणों को चूल्हा जलाने के लिए ईंधन, मवेशियों के लिए चारा और आंधी में टूटकर गिरने वाली पेड़ों की टहनियों से घर के काम के लिए उपयोगी लकड़ी मिल जाती है। हालांकि, अवैध कटाई का खतरा अब भी बना रहता है, लेकिन नए पौधों को नुकसान से बचाने के लिए पौधरोपण वाले इलाकों में पांच साल तक मवेशियों के प्रवेश पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।
इमारती लकड़ी और फलदार पौधों का संरक्षण
इस मुहिम के तहत कई बहुमूल्य पेड़ों को बचाया गया है। कर्री गांव के जंगलों में मुख्य रूप से सागौन, खैर, शीशम, बांस, आंवला, सिरस, अरुण, कंजी, सेमिया और सहिजन के पेड़ मौजूद हैं। वहीं, कोन ब्लॉक के पिपरहर इलाके में सिद्धा और भरहुल के पेड़ों का संरक्षण किया गया है। इसके अलावा, जुगैल क्षेत्र में साखू, कहुआ और सागौन जैसी कीमती इमारती लकड़ियों वाले जंगलों को पूरी तरह सुरक्षित किया गया है।