राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की परियोजना के तहत बिहार में मखाना उत्पादन के साथ-साथ मछली पालन और दूसरी जलीय फसलों की संयुक्त खेती को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ी योजना शुरू हुई है। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के क्षेत्राधिकार में आने वाले 11 कृषि संस्थानों को लगभग 1.05 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई है। इस पहल का मकसद मखाना किसानों की आमदनी बढ़ाने पर है।
मखाने की आधुनिक खेती सीखेंगे किसान
इस योजना के तहत अंग और कोसी-सीमांचल क्षेत्र के 44 चुने गए जलक्षेत्रों में किसानों को आधुनिक वैज्ञानिक खेती सिखाई जाएगी। कुल 750 किसानों को प्रायोगिक प्रशिक्षण मिलेगा। उच्च गुणवत्ता वाले बीज के लिए 6 प्रमुख इकाइयों में उन्नत बीजों का उत्पादन व वैज्ञानिक भंडारण होगा। कृषि विभाग ने बीज उत्पादन लागत 1.58 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तय की है।
केवीके से कृषि कॉलेज तक निभाएंगे भूमिका
योजना के कुल बजट में से मखाना और मछली पालन के एकीकरण पर 88 लाख रुपये, बीज उत्पादन पर 9.48 लाख रुपये और किसानों के प्रशिक्षण पर 7.50 लाख रुपये खर्च होंगे। यह कार्य कृषि विज्ञान केंद्रों, क्षेत्रीय अनुसंधान संस्थानों और कृषि कॉलेजों के जरिए होगा।
केवीके को मिला बजट, कहां होगा खर्च?
पूर्णिया की बात करें तो भोला पासवान शास्त्री कृषि कॉलेज को सबसे अधिक 18.82 लाख रुपये मिले हैं। यहां उन्नत बीज उत्पादन की 4 इकाइयां स्थापित होंगी और 450 किसानों को प्रशिक्षित किया जाएगा।
कृषि विज्ञान केंद्र सुपौल और कटिहार में 6-6 स्थानों और अररिया समेत किशनगंज में 5-5 जगहों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। भागलपुर (सबौर) में कृषि विज्ञान केंद्र को 4.30 लाख रुपये मिले हैं। इसमें से 30 हजार रुपये 30 प्रगतिशील किसानों के आवासीय और गैर-आवासीय प्रशिक्षण पर खर्च होंगे। बाकी बचे 4 लाख रुपये से दो अत्याधुनिक तकनीकी प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे, जिनमें पोषक तत्वों का उपयोग, कीट-रोग नियंत्रण, जल प्रबंधन और फसल कटाई उपरांत मूल्य संवर्धन के तरीके सिखाए जाएंगे।
मछली पालन की मदद से किसानों का जोखिम होगा कम
कुलपति डॉ. डीआर सिंह के अनुसार, मखाने के खेतों में मछली पालन से किसानों की जोखिम क्षमता घटेगी और कम लागत में दोहरा मुनाफा मिलेगा। वैज्ञानिक सीधे खेतों में जाकर जानकारी देंगे, जिससे बिहार का मखाना वैश्विक बाजार में अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतर सकेगा।