साल 2026 सरकार के पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने के कार्यक्रम का इम्तिहान ले रहा है। इस खरीफ कम मानसूनी बारिश का खराब असर मक्का और गन्ने पर देखने को मिला है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार इथेनॉल के बजाय अब खाद्य महंगाई से निपटने पर जोर दे रही है।
कमजोर मानसून ने बढ़ाई महंगाई और फसलों की चिंता
इस बार अल नीनो के चलते मानसूनी बारिश में 13 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली है। इस तरह फसलों की उपलब्धता को लेकर अनुमान कमजोर हुए हैं, जिससे बाजार में मक्का और चानी की कीमतों में काफी तेजी देखने को मिली है। दूसरी तरफ चावल के भाव भी बढ़े हैं। इस सब की वजह से सितंबर महीने की खाद्य महंगाई बढ़कर 7.74 प्रतिशत हुई, जो अगस्त में 5.97 प्रतिशत थी।
15 से 17 प्रतिशत तक गिर सकता है ब्लेंडिंग का लक्ष्य
कृषि व्यवसाय कंपनी केएन एग्री रिसोर्सेज के चेयरमैन और खाद्य नीति विशेषज्ञ जी.के. सूद कहते हैं कि चालू आपूर्ति सीजन में पेट्रोल में इथेनॉल का हिस्सा घटकर लगभग 15 प्रतिशत तक आ सकता है। उन्होंने साफ किया कि सूखे के साल में देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए ईंधन से ज्यादा जरूरी भोजन है, इसलिए भोजन को ही प्राथमिकता दी जाएगी।
एक रिपोर्ट के अनुसार, चार इथेनॉल कंपनियों का मानना है कि सम्मिश्रण का स्तर 20 प्रतिशत से गिरकर 15 से 17 प्रतिशत पर आ सकता है।
चावल का इस्तेमाल सरकार के लिए महंगा सौदा
केंद्र सरकार ने मौजूदाी सीजन में पहली ही गन्ना आधारित इथेनॉल को सीमित कर दिया है। मक्के के बाद चावल इथेनॉल के लिए अच्छा विकल्प माना जाता है, लेकिन सरकारी भंडारण से चावल का ज्यादा इस्तेमाल सरकार के लिए काफई महंगा साबित हो रहा है।
गन्ना और मक्का आधारित इथेनॉल पर सरकार का बड़ा कदम
बता दें कि सरकार इथेनॉल कंपनियों को चावल उसकी खरीद और भंडारण (गोदाम में रखने) की असल लागत के लगभग आधे दाम पर बेचती है। इसे देखते हुए सरकार ने अपनी नीतियों में बदलाव भी किया है। सरकार ने पिछले महीने तेल विपणन कंपनियों निर्देश दिया था कि वे नए आपूर्ति सीजन में गन्ने से बने इथेनॉल की खरीद न करें। इसके अलावा सरकार ने मक्के से बनने वाले इथेनॉल की खरीद कीमत भी 71.86 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 68.86 रुपये प्रति लीटर कर दी है, जिससे उत्पादकों के मुनाफे पर असर पड़ा है।
उत्पादकों की मुश्किलें और पशुचारे पर संकट
ग्रेन एथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सी.के. जैन के अनुसार, निर्माता अब खराब अनाज का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे पशुओं के चारे की उपलब्धता को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं। उद्योग के अनुमान के मुताबिक, इस साल मक्के का उत्पादन रिकॉर्ड 5.5 करोड़ (55 मिलियन) टन से 15 प्रतिशत तक गिर सकता है।
हैदराबाद की ट्रेडिंग कंपनी आईएलए कमोडिटीज के निदेशक हरीश गलिपल्ली ने बताया कि कई राज्यों में सूखे के कारण किसानों के पास पर्याप्त पानी नहीं है, इसलिए सर्दियों के मौसम में भी मक्के की बुवाई बढ़ने की उम्मीद बहुत कम है।