दक्षिण भारत के कुन्नूर में चाय निर्माताओं ने चाय बोर्ड के उस फैसले का कड़ा विरोध किया है, जिसमें सीटीसी चाय की नई फैक्ट्रियां लगाने के लिए नए आवेदनों पर रोक लगा दी गई है। निर्माताओं ने चेतावनी दी है कि इस कदम से बाजार में प्रतिस्पर्धा खत्म होगी, नया निवेश रुकेगा और हजारों छोटे चाय किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।
बिना चर्चा के लिया गया फैसला
चाय निर्माताओं ने इस फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए टी बोर्ड को एक ज्ञापन सौंपा है। निर्माताओं का कहना है कि बोर्ड ने उद्योग से जुड़े लोगों और किसानों से सलाह लिए बिना ही यह पाबंदी लगा दी है। उन्होंने टी बोर्ड से मांग की है कि जब तक उनकी चिंताओं का समाधान नहीं हो जाता, तब तक इस फैसले पर रोक लगाई जाए। उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, नीलगिरी जिले में लगभग 200 से 250 'बॉट-लीफ' (किसानों से पत्तियां खरीदकर चाय बनाने वाली) फैक्ट्रियां हैं, जबकि पूरे देश में ऐसी लगभग 1,000 इकाइयां काम कर रही हैं।
टी बोर्ड ने नहीं बताया कोई स्पष्ट कारण
निर्माताओं का कहना है कि टी बोर्ड की ओर से इस पाबंदी का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है। सूत्रों ने याद दिलाया कि कुछ साल पहले भी टी बोर्ड द्वारा ऐसी ही रोक लगाई गई थी, लेकिन तब उद्योग जगत के विरोध और बातचीत के बाद उस फैसले को वापस ले लिया गया था।
पिछले पांच सालों में किसानों को हुआ है सीधा फायदा
पिछले पांच सालों में चाय उद्योग में हुए बदलावों से कुन्नूर के छोटे चाय उत्पादकों को काफी फायदा हुआ है और बाजार तक उनकी पहुंच आसान हुई है। आज स्थिति यह है कि जब चाय का उत्पादन सबसे ज्यादा होता है, तब भी किसानों को अपनी हरी पत्तियां बेचने में कोई परेशानी नहीं होती और उन्हें अपनी फसल का अच्छा दाम मिल जाता है। फैक्ट्रियों की संख्या बढ़ने और उनके बीच प्रतिस्पर्धा होने से किसानों की मोलभाव करने की ताकत भी बढ़ी है। सूत्रों का कहना है कि नई पाबंदियां लगाने से पहले किसानों को हो रहे इस फायदे का आकलन किया जाना चाहिए, क्योंकि नई रोक से यह फायदा छिन सकता है।
पुरानी मशीनों से किसानों को होता है आर्थिक नुकसान
उद्योग जगत के अनुसार, मौजूदा समय में कई पुरानी फैक्ट्रियां अभी भी पुरानी मशीनों और खराब तरीकों से काम कर रही हैं। इसके कारण उनके द्वारा बनाई जाने वाली चाय की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती, जिससे बाजार में उन्हें कम दाम मिलते हैं और अंततः वे किसानों को भी उनकी पत्तियों का कम पैसा देते हैं। इसके विपरीत, आधुनिक और नई फैक्ट्रियां उसी हरी पत्ती से बेहतरीन क्वालिटी की चाय बनाती हैं, जिसके उन्हें बाजार में ऊंचे दाम मिलते हैं और वे किसानों को भी बेहतर कीमत दे पाती हैं।
यही कारण है कि चाय निर्माताओं ने टी बोर्ड से अपील की है कि वह अपने इस आदेश को अभी रोक दे और चाय बागान मालिकों, भविष्य में निवेश करने वाले लोगों और छोटे चाय किसानों के प्रतिनिधियों के साथ इस मुद्दे पर विस्तार से बातचीत करे।