बीते एक दशक में भारत के फल और सब्जियों के उत्पादन में होने वाली बढ़ोतरी पहले के दशकों की तुलना में कुछ सुस्त हुई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के आंकड़ों के हवाला देते हुए एक शोध पत्र में यह बात सामने आई है। दूसरी ओर अनाज उत्पादन में इस अवधि के दौरान भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है।
कृषि नीतियों का अनाज पर काफी ज्यादा फोकस
उत्पादन में बढ़ोतरी की रफ्तार में आई इस सुस्ती के पीछे सरकारी नितियो का अनाज पर काफी अधिक फोकस को प्रमुख कारण बताया गया है। बियॉन्ड द ग्रीन रिवॉल्यूशन: अनरेवलिंग न्यू डायनेमिक्स ऑफ इंडियाज एग्री-फूड सिस्टम ट्रांसफॉर्मेशन नाम के इस पेपर को आईसीएआर के महानिदेशक एम. एल. जाट, पी. एस. बिरथल और एस. जे. बालाजी ने लिखा है। लेखकों ने वर्तमान सरकारी खरीद प्रणाली की आलोचना करते हुए कहा है कि यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।
गेहूं-धान पर फोकस, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव
लेखकों का मानना है कि धान और गेहूं को प्राथमिकता देने वाली मौजूदा व्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव डालती है और किसानो को फसल विविधीकरण यानी दूसरी फसलें उगाने से रोकती है। शोध पत्र में अनाज खरीद के वर्तमान मॉडल में बदलाव की वकालत करते हुए बाजार से जुड़ी नई प्रणाली को बढ़ावा देने पर जोर दिया है।
तीन चरणों में फल-सब्जी और अनाज उत्पादन में उतार-चढ़ाव
आईसीएआर के आंकड़े बताते हैं कि साल 2015 से 2025 के बीच फलों और सब्जियों के उत्पादन में सालाना 76 लाख टन का उछाल दर्ज किया गया, जो 1996 से 2014 के बीच 77 लाख की सालाना बढ़ोतरी से थोडी कम है। हालांकि यह बढ़ोतरी 1967 से 1995 की अवधि की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा है।
इस शोध पत्र में कृषि उत्पादन वृद्धि को तीन अलग-अलग चरणों में बांटा गया है, तकनीक-आधारित अनाज गहनता (1967–95), मांग-आधारित विविधीकरण (1996–2014), और स्थिरता-आधारित विविधीकरण (2015–25)।
तीसरे चरण में फल उत्पादन गिरा, सब्जी स्थिर
फलों की श्रेणी में, इन तीनों चरणों के दौरान सालाना वृद्धि दर 8 लाख टन से बढ़कर 27 लाख टन हुई, और फिर यह मामूली रूप से घटकर 26 लाख टन रह गई। वहीं, सब्जियों के मामले में यह उछाल 16 लाख टन से बढ़कर 50 लाख टन तक पहुंची और अब इसी आंकड़े पर स्थिर है। इसके ठीक उलटी, इसी समयावधि में खाद्यान्न उत्पादन की सालाना वृद्धि 41 लाख टन से घटकर 39 लाख टन हुई और फिर अचानक से उछाल के साथ 84 लाख टन पर पहुंच गई।
1996 से 2014 के पीच बागवानी फसलों पर फोकस
जानकारों का कहना है कि 1996 से लेकर 2014 के बीच भारत ने अनाज से हटकर बागवानी फसलों पर फोकस करना शुरू किया था, जिससे इस अवधि में बागवानी उत्पादन में भारी उछाल आया। सरकार ने इस अवधि में फल और सब्जी किसानों के लिए कई पहले भी शुरू की थी।
कृषि विकास के लिए नए मोर्चों की ओर बढ़ने की जरूरत
आईसीएआर के महानिदेशक एम. एल. जाट का कहना है कि बागवानी फसलों की अपनी कुछ प्राकृतिक सीमाएं होती हैं, इसलिए इनके उत्पादन के मौजूदा स्तर को बनाए रखना भी एक उपलब्धि मानी जानी चाहिए। उनके अनुसार, हमें वर्तमान खरीद-आधारित समर्थन के बजाय अधिक बाजार-आधारित और मूल्य-श्रृंखला उन्मुख कृषि विकास की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
अनाज उत्पादन ने कृषि विकास को रफ्तार दी
दूसरी ओर, विश्लेषण में शामिल अर्थशास्त्रियों ने बताया कि हर बूंद, अधिक फसल जैसे सरकारी कार्यक्रमों, बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों और तकनीक के विकास ने अनाज के उत्पादन को बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया है। अनाज उत्पादन में हुई इस वृद्धि ने कृषि विकास दर को भी तेज किया है। पहले दो चरणों में जो कृषि विकास दर लगभग 3% थी, वह अब बढ़कर लगभग 4.5% तक पहुंच गई है।