सरकार के इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को लेकर जानकार खाद्य बनाम ईंधन का हवाला देते हुए चिंता जताते आए हैं। उनका तर्क है कि अगर गन्ना और मक्के जैसी फसलों से इथेनॉल का उत्पादन होगा, तो चीनी मिलों, पशु चारा और इथेनॉल उद्योग के बीच फसलों के लिए प्रतिस्पर्धा (होड़) का जन्म होगा।
ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के उप महानिदेशक (डीडीजी) भारती बालाजी का कहना है कि इथेनॉल उद्योग मक्के के लिए किसी भी क्षेत्र के साथ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहा है। बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार भारती बालाजी का कहना है कि इथेनॉल का मुख्य मकदस देश की उर्जा सुरक्षा को मजबूत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देना है। बालाजी के अनुसार, इस समय इथेनॉल उत्पादन के लिए किसी एक फसल पर निर्भरता नहीं है, बल्कि इसमें मक्का, एफसीआई के अतिरिक्त चावल, खराब अनाज गन्ने से जुड़े उत्पादों का संतुल्त उपयोग किया जा रहा है।
कुल इथेनॉल आपूर्ति में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी अनाजों की
ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के उप महानिदेशक का कहना है कि अनाज इथेनॉल कार्यक्रम का मुख्य स्तंभ बन चुका है। अगस्त के आखिर तक कुल 895 करोड़ लीटर इथेनॉल की सप्लाई की गई थी, जिसमें से लगभग 70 प्रतिशत इथेनॉल अनाज से तैयार किया गया है। उन्होंने बताया कि इसमें मक्के से लगभग 345 लीटर, एफसीआई के चावल से करीब 214 लीटर और खराब अनाजों से लगभग 64 करोड़ लीटर इथेनॉल का उत्पादन किया गया है।
मक्के से पहले इथेनॉल उत्पादन में गन्ने की धमक
भारती बालाजी के अनुसार, पहले इथेनॉल के लिए अधिकतर गन्ने के रस और शीरे पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अभ मक्का और दूसरे अनाजों के जुड़ने से इथेनॉल उद्योग को मजबूत और लचीला आधार मिला है।
किसानों की फसल और अनुपयोगी अनाज का सही इस्तेमाल
उप महानिदेशक के अनुसार, मक्के का उपयोग भोजन, पशु आहार और औद्योगिक कार्यों में भी होता है। इसलिए मक्के की कीमतें केवल इथेनॉल से तय नहीं होतीं, बल्कि कुल पैदावार, मांग, स्टॉक और ढुलाई व्यवस्था के संतुलन पर निर्भर करती हैं। इथेनॉल बनने से मक्के के लिए एक नया और अतिरिक्त बाजार मिला है, जिससे किसानों के संसाधनों का मूल्य बढ़ता है।
इसके अलावा, एफसीआई के अतिरिक्त चावल का सही उपयोग सुनिश्चित हो रहा है। साथ ही, जो अनाज खराब हो जाता है और इंसानों के खाने के लायक नहीं रहता, उसे भी फैक्ट्रियों में इथेनॉल बनाने के काम में लाया जा रहा है। इससे उस अनाज का भी सही दाम निकल आता है, जो अन्यथा बर्बाद हो जाता। यदि किसी सीजन में किसी एक फसल की कमी होती है, तो अन्य विकल्प उत्पादन को बिना रुकावट जारी रखने में मदद करते हैं।
भविष्य में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों और नए ईंधनों से बढ़ेगी मांग
भारती बालाजी ने बताया कि भारत के इथेनॉल सफर के अगले चरण में उत्पादन के साथ-साथ इसकी नई मांग पैदा करना सबसे अहम होगा। आने वाले समय में फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों (जो अधिक इथेनॉल वाले ईंधन से चलते हैं), 100 प्रतिशत इथेनॉल से चलने वाले वाहनों, कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) और टिकाऊ विमानन ईंधन के जरिए इथेनॉल की मांग में भारी बढ़ोतरी की संभावनाएं हैं।
उन्होंने कहा कि इन नई तकनीकों को जमीन पर उतारने के लिए ईंधन की आसान उपलब्धता, पेट्रोल पंपों पर जरूरी व्यवस्था और वाहनों के मानकों पर ध्यान देना होगा। स्थिर सरकारी नीतियों और खेतों से लेकर कारखानों तक बेहतर तालमेल के जरिए ही उद्योग की पूरी क्षमता का सही उपयोग किया जा सकेगा।