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Karnataka Rs 2500 Aid To Drought Affected Farmers Organisations Say Inadequate
कर्नाटक : सूखा प्रभावित किसानों को 2500 रुपये की मदद, किसान संगठनों ने बताया अपर्याप्त
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Sun, 27 Sep 2026 04:18 PM IST
सार
कर्नाटक सरकार ने गंभीर सूखे से प्रभावित किसानों को पहली किस्त में 1,250 करोड़ रुपये की इनपुट सब्सिडी देने का फैसला किया है। करीब 45 से 50 लाख किसानों को 2,500 रुपये प्रति किसान की सहायता मिलेगी। राज्य सरकार के अनुसार सूखे से नुकसान 40 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है।
कर्नाटक में गंभीर सूखे से परेशान किसानों को राज्य सरकार ने पहली किस्त में 1,250 करोड़ रुपये की इनपुट सब्सिडी देने का फैसला किया है। इससे करीब 45 से 50 लाख किसानों को लाभ मिलने का अनुमान है। प्रत्येक किसान को 2,500 रुपये दिए जाएंगे। हालांकि, किसान संगठनों का कहना है कि सूखे से हुए नुकसान की तुलना में यह सहायता काफी कम है और किसानों को ज्यादा मुआवजे की जरूरत है।
राज्य में सूखे की स्थिति पर चार दिन चले विशेष विधानसभा सत्र के बाद सरकार ने यह घोषणा की। उपमुख्यमंत्री और राजस्व मंत्री डॉ. जी. परमेश्वर ने विधानसभा में कहा कि केंद्र से राष्ट्रीय आपदा मोचन कोष (NDRF) से सहायता मिलने का इंतजार है। इसी बीच किसानों को तत्काल राहत देने के लिए राज्य सरकार ने अपने स्तर पर 1,250 करोड़ रुपये जारी करने का फैसला किया है।
किसान संगठन अधिक मुआवजे की मांग कर रहे
किसानों का कहना है कि लंबे समय से बारिश की कमी और सूखे के कारण फसलें खराब हो रही हैं। इससे उनकी आमदनी प्रभावित हुई है और कई किसान कर्ज के दबाव में आ सकते हैं। विपक्ष ने सरकार की 2,500 रुपये की सहायता को अपर्याप्त बताया है। कर्नाटक किसान संघों के महासंघ के अध्यक्ष कुरुबुरु शांताकुमार ने भी इस राशि पर नाराजगी जताई। उन्होंने किसानों के लिए कर्ज माफी और 25,000 रुपये प्रति एकड़ मुआवजे की मांग की है। साथ ही उन्होंने NDRF और राज्य आपदा मोचन कोष (SDRF) के तहत मिलने वाली सहायता के नियमों में बदलाव की मांग भी की।
किसानों ने लंबी अवधि के उपाय सुझाए
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कलाबुरगी के पास पट्टन गांव के एक किसान ने कहा कि केवल तत्काल आर्थिक मदद से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। उन्होंने गांवों में पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए हर गांव में तालाब, बेहतर सड़कें, कृषि उपज रखने के लिए गोदाम और सिंचाई पंपों के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध कराने की मांग की।
उन्होंने बताया कि उन्होंने करीब साढ़े तीन एकड़ जमीन को कुआं खोदकर सिंचित बनाया और खेती के साथ बागवानी और डेयरी को भी अपनाया। इससे उन्हें सूखे का असर कम झेलना पड़ा। हालांकि, राज्य में ऐसे किसानों की संख्या अभी बहुत कम है।
सूखे से 40 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा नुकसान का अनुमान
राज्य सरकार का अनुमान है कि कर्नाटक में सूखे से होने वाला नुकसान 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो सकता है। केंद्र की एक अंतर-मंत्रालयी टीम जल्द ही राज्य का दौरा कर स्थिति का आकलन कर सकती है। इसके बाद केंद्र से मिलने वाली सहायता के आधार पर राहत की राशि में बदलाव हो सकता है।
कृषि विशेषज्ञ और कर्नाटक कृषि मूल्य आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. टी.एन. प्रकाश कम्मारडी ने कहा कि सूखा घोषित होने के बाद केंद्र से मिलने वाली सहायता की प्रक्रिया में देरी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कृषि विभाग और कृषि विश्वविद्यालयों को मिलकर किसानों को बदलते मौसम और जलवायु से जुड़ी चुनौतियों के लिए तैयार करने की जरूरत बताई।
पश्चिमी घाट के मुद्दे पर भी विधानसभा में चर्चा
विशेष सत्र में पश्चिमी घाट के पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र (ESA) को लेकर केंद्र के सातवें मसौदा नोटिफिकेशन पर भी चर्चा हुई। यह मसौदा डॉ. के. कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट पर आधारित है। विधानसभा ने मौजूदा रूप में इस मसौदे को स्वीकार नहीं करने का प्रस्ताव पारित किया और पूरे क्षेत्र का जमीन पर विस्तृत सर्वे पूरा करने के लिए और समय मांगा।
सूखे के मुद्दे पर भी अलग-अलग दलों के विधायकों ने किसानों की समस्याएं उठाईं और कई सुझाव दिए। वहीं, सूखे से निपटने में देरी को लेकर विपक्ष ने राज्य सरकार पर सवाल उठाए, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष ने केंद्र से मिलने वाली सहायता का मुद्दा उठाया।
राज्य के सामने राहत और आर्थिक दबाव दोनों चुनौती
कर्नाटक सरकार पहले से ही आर्थिक दबाव का सामना कर रही है। वित्त विभाग ने अधिक खर्च को लेकर सरकार को सावधानी बरतने की सलाह दी है। कई विभागों में धन की कमी का असर वेतन भुगतान तक पर पड़ने की बात सामने आई है।
ऐसे में सरकार के सामने एक ओर सूखा प्रभावित किसानों को पर्याप्त राहत देने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर राज्य के सीमित संसाधनों के बीच खर्च का प्रबंधन करना भी चुनौती है। किसानों की मांग है कि तत्काल सहायता के साथ सिंचाई, पानी, भंडारण और कृषि आय बढ़ाने के लिए लंबी अवधि की ठोस व्यवस्था भी की जाए।
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