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पंजाब से NCR तक पहुंचा पराली का धुआं: ब्लैक कार्बन से जहरीली हो रही उत्तर भारत की हवा, इन राज्यों पर भी असर

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Wed, 04 Nov 2026 01:13 PM IST
सार

पंजाब में पराली जलाने से ग्रामीण इलाकों की हवा में 48 फीसदी ब्लैक कार्बन बढ़ रहा है। PGI, पंजाब यूनिवर्सिटी और IIT दिल्ली की स्टडी में खुलासा हुआ है कि पराली का धुआं दिल्ली-NCR समेत उत्तर भारत की हवा और लोगों की सेहत को प्रभावित कर रहा है।

पराली की आग (फाइल फोटो)
पराली की आग (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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पंजाब में पराली जलाने का असर अब केवल खेतों और आसपास के गांवों तक सीमित नहीं है। इसका धुआं हवा के साथ दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक पहुंच रहा है। पराली जलने से निकलने वाले बारीक काले कण यानी ब्लैक कार्बन हवा को जहरीला बना रहे हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी (PU), पीजीआई और आईआईटी दिल्ली की एक संयुक्त स्टडी में यह बात सामने आई है। इसके मुताबिक, पंजाब के ग्रामीण इलाकों की हवा में मौजूद कुल ब्लैक कार्बन का करीब 48 फीसदी हिस्सा फसल अवशेष जलाने से निकलता है।

स्टडी के दौरान खरीफ सीजन में खेतों के आसपास हवा की गुणवत्ता की जांच की गई। इसमें पाया गया कि पराली जलाने से निकलने वाला धुआं ग्रामीण इलाकों में ब्लैक कार्बन का सबसे बड़ा स्रोत है। पराली जलाने के समय यानी दोपहर 1 बजे से शाम 6 बजे के बीच इसकी हिस्सेदारी कई बार 90 फीसदी से भी अधिक पहुंच गई।

वाहन और पावर प्लांट भी बढ़ा रहे प्रदूषण
स्टडी में ब्लैक कार्बन के दूसरे स्रोतों की भी पहचान की गई। इसमें पावर प्लांटों की हिस्सेदारी 24 फीसदी, वाहनों की 20.2 फीसदी, उद्योगों की 6.1 फीसदी और कचरा जलाने की हिस्सेदारी 2 फीसदी पाई गई। शोधकर्ताओं ने हवा की गति और दिशा का भी अध्ययन किया। इससे पता चला कि पंजाब में पराली जलाने से निकलने वाला धुआं दूसरे राज्यों तक पहुंच रहा है और उत्तर भारत के बड़े हिस्से की हवा को प्रभावित कर रहा है।

क्या है ब्लैक कार्बन और सेहत को कितना नुकसान?
ब्लैक कार्बन बेहद छोटे काले कण होते हैं, जो पराली, लकड़ी, कोयला और दूसरे ईंधन जलने से निकलते हैं। ये हवा में लंबे समय तक तैरते रहते हैं और पीएम 2.5 प्रदूषण का हिस्सा होते हैं। इनका जीवनकाल करीब 4 से 7 दिन होता है। सांस के जरिए शरीर में पहुंचने पर ये स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।

पीजीआई के प्रोफेसर रविंद्र खैवाल के मुताबिक, ब्लैक कार्बन बढ़ने से अस्थमा, दिल का दौरा और स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि पराली जलाने पर रोक लगाने के साथ वाहनों और फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषण को भी कम करना जरूरी है।

पराली प्रबंधन के लिए क्या हैं सुझाव?
स्टडी में प्रदूषण कम करने के लिए किसानों को पराली प्रबंधन के बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने की सिफारिश की गई है। इसके लिए सरकार और संबंधित विभागों को ये कदम उठाने चाहिए:
  • किसानों को पराली प्रबंधन की मशीनें समय पर और कम किराये पर उपलब्ध कराई जाएं।
  • पराली से बिजली बनाने वाली परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जाए।
  • फसल अवशेषों से बायोफ्यूल और बायोमास पेलेट तैयार करने पर जोर दिया जाए।
  • पावर प्लांट, वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले ब्लैक कार्बन को कम किया जाए।
  • किसानों को पराली जलाने के बजाय उसके उपयोग के आर्थिक विकल्प दिए जाएं।

इस अध्ययन में पीजीआई और पंजाब यूनिवर्सिटी की टीम के साथ डॉ. मयंक कुमार तथा आईआईटी दिल्ली के विकास गोयल और अजीत कुमार शामिल थे।
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