जनवरी के बाद से सल्फर की कीमतों में आया दोगुना से ज्यादा का उछाल उर्वरक कारखानों के लिए परेशानी का कारण बन गया है। उद्योग अनुमानों के अनुसार, सल्फर की कीमत दोगुना से ज्यादा बढ़कर 900 से 1,100 डॉलर प्रति टन के बीच पहुंच गई है। हालांकि कुछ अनुमान इन कीमतों को 1,050 से 1,100 डॉल प्रति टन भी बता रहे हैं। सल्फर की कीमतों में उछाल ने डीएपी, सिंगल सुपर फॉस्फेट और दूसरी मिश्रित खादों की उत्पादन लागत बढ़ाने का काम किया है। जानकारों का कहना है कि कीमतों में यह तेजी बनी रही, तो सरकार का उर्वरक सब्सिडी खर्च काफी बढ़ सकता है।
एक टन डीएपी बनाने में 0.20 टन सल्फर की खपत
सल्फर खाद बनाने का एक प्रमुख कच्चा माल है। जानकारों के अनुसार, रॉक फॉस्फेट को फॉस्फोरिक एसिड और आखिर में डीएपी और दूसरी खादों में बदलने के लिए सल्फर बेहद जरूरी है। एक टन डीएपी बनाने के लिए लगभग 0.18-0.20 टन सल्फर की आवश्यकता होती है।
वैश्विक उथल-पुथल ने बिगाड़ा गणित
उद्योग जानकारों का कहना है कि अमेरिका-ईरान और रूस यूक्रेन युद्ध की वजह से उर्जा उत्पादन और व्यापारिक मार्गों (जैसे होर्मुज) में आई बाधाओं ने सल्फर को महंगा किया है। इसके अलावा चीन और रूस द्वारा निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने भी वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित किया है।
खाद की कमी नहीं, लेकिन सब्सिडी का बजट बिगड़ने का डर
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या खाद की कमी नहीं, बल्कि उत्पादन लागत का बढ़ना है। मीरचंदानी ने संकेत दिया कि कंपनियां खरीफ और रबी सीजन के लिए खाद का उत्पादन और उपलब्धता बनाए रखने पर ध्यान देंगी, लेकिन लागत बढ़ने से उनका मुनाफा कम हो रहा है। सॉल्यूबल फर्टिलाइजर इंडस्ट्री एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीब चक्रवर्ती का कहना है कि कंपनियां अंतिम कीमतों को सस्ता रखने के लिए अपना मुनाफा कम करेंगी, लेकिन फिर भी किसानों और सरकार पर उच्च सब्सिडी के माध्यम से अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
यूरिया को NBS में लाने पर सरकार का विचार
द इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू उत्पादन लागत बढ़ने के कारण सरकार न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी योजना के तहत डीएपी के लिए अलग-अलग सब्सिडी देने पर विचार कर रही है। ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार ने 2026-27 के लिए उर्वरक सब्सिडी का बजट 1.71 लाख करोड़ रुपये रखा है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सल्फर महंगा होने के कारण यह बजट अनुमान से काफी ऊपर जा सकता है, क्योंकि NBS के तहत सरकार खाद में मौजूद पोषक तत्वों पर सब्सिडी देती है, न कि कच्चे माल की कीमत पर।
आगे का रास्ता: घरेलू उत्पादन और लंबे अनुबंधों पर जोर
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खाद उपभोक्ता और तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। देश अपनी जरूरत का आधे से ज्यादा सल्फर आयात करता है, जबकि बाकी हिस्सा घरेलू रिफाइनरियों से आता है। दुनिया का 90 प्रतिशत सल्फर खदानों से नहीं, बल्कि पेट्रोलियम और गैस रिफाइनरियों से उत्पादित होता है।
सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड के लिए अनुबंध और घरेलू उत्पादन बढ़ाने का सुझाव
जानकार सुझाव देते हैं कि भारत को मात्र रॉक फॉस्फेट खदानें अपने साथ करने से खाद सुरक्षा नहीं मिलेगी। इसके साथ-साथ सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड के लिए भी ठोस रणनीति बनानी होगी। विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को प्रमुख उत्पादक देशों के साथ लंबे समय के अनुबंध करने चाहिए और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए देश की रिफाइनरियों से सल्फर की रिकवरी को बढ़ावा देना चाहिए।