वर्तमान में भारत को दूसरी पीली क्रांति की काफी जरूरत है। घरेलू मांग को पूरा करने के लिए देश को हर साल 1.6 करोड़ से 1.7 करोड़ टन खाने के तेल का विदेश से आयात करना पड़ रहा है। उद्योग के आंकड़े बताते हैं कि घरेल खाद्य तेल बाजार करीब 34.75 अरब डॉलर का है। दूसरी तरफ 2024-25 में खाद्य तेल का आयात पर ही लगभग 18.3 अरब डॉलर खर्च किए गए।
ऐसे में सरकार साल 2021 में लॉन्च हुए राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन के तहत ताड़ और पारंपरिक तिलहन फसलों के रकबे को बढ़ाने पर जोर दे रही है। इस मिशन के तहत ताड़ी की खेती के रकबे में बढ़ोतरी के लिए पूर्वोत्तर पर खासा फोकस किया जा रहा है।
दूसरी पीली क्रांति का इतिहास
भारत में पहली पीली क्रांति की शुरुआत साल 1986-87 में हुई थी। इसका उद्देश्य सरसों, मूंगफली और सोयाबीन सहित नौ पारंपरिक तिलहन फसलों का उत्पादन बढ़ाना था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इन तिलहनों का कुल उत्पादन शुरुआती 1.26 करोड़ टन से बढ़कर वर्ष 2025-26 में अनुमानित 4.306 करोड़ टन तक पहुंच गया है। इसके बावजूद देश की खाद्य तेल की मांग पूरी करने के लिए आयात की जरूरत बनी हुई है।
2030-31 तक उत्पादन 2.545 करोड़ टन करने की योजना
इसी अंतर को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने अगस्त 2021 में 11,040 करोड़ रुपये के बजट के साथ राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-ऑयल पाम शुरू किया। योजना के तहत वर्ष 2030-31 तक देश में 2.545 करोड़ टन खाद्य तेल उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसके जरिए घरेलू जरूरत का करीब 72 प्रतिशत हिस्सा देश में ही पूरा करने की योजना है। साथ ही, कच्चे पाम तेल का उत्पादन बढ़ाकर 28 लाख टन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
पारंपरिक तिलहनों के मुकाबले अधिक उपज, दो दशक तक आमदनी
ताड़ की खेती में उत्पादकता पारंपरिक तिलहन फसलों की तुलना में ज्यादा है। अनुकूल परिस्थितियों में एक हेक्टेयर क्षेत्र से 20 से 25 टन ताजे फलों के गुच्छे मिल सकते हैं। इनसे लगभग 4 से 5 टन पाम तेल और आधा टन कर्नेल तेल प्राप्त होता है। दिए गए आंकड़ों के अनुसार, इसकी उत्पादकता सरसों और मूंगफली जैसे पारंपरिक तिलहनों के मुकाबले करीब पांच गुना अधिक है। पाम का पेड़ रोपाई के तीन से चार साल बाद फल देना शुरू करता है और करीब 20 वर्षों तक उत्पादन देता है।
ताड़ी की खेती में बाजार की मार से बचाने की पहल
ताड़ किसानों को कीमतों में गिरावट से बचाने के लिए सरकार ने दो मोर्चे पर मूल्य तय करने वाली व्यवस्था बनाई है। इसमें बाजार से जुड़ा मासिक फॉर्मूला मूल्य और केंद्र सरकार की ओर से तय वार्षिक वायबिलिटी मूल्य शामिल है। बाजार भाव कम होने पर दोनों के बीच का अंतर सरकार प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के जरिए किसानों के बैंक खातों में भेजती है।
ताड़ के रकबे में बढ़ोतरी के साथ प्रसंस्करण सुविधा को भी विस्तार दिया जा रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि पाम के फलों की तुड़ाई के 24 घंटे के अंदर प्रसंस्करण करना होता है। ऐसे में खेतों के प्रसंस्करण काफी जरूरी हो जाता है।
आंध्र प्रदेश में सबसे अधिक उत्पादन, पूर्वोत्तर राज्यों पर खासा फोकस
आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में 15 राज्यों के करीब 3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ऑयल पाम की खेती शुरू की गई है। वर्तमान में आंध्र प्रदेश देश के कुल कच्चे पाम तेल उत्पादन में करीब 83 प्रतिशत योगदान के साथ पहले स्थान पर है। वर्ष 2025-26 में देशभर में ताड़ की खेती का रकबा 52,113 हेक्टेयर बढ़ा। इसमें आंध्र प्रदेश का योगदान 30,364 हेक्टेयर रहा, जबकि तेलंगाना में करीब 12,000 हेक्टेयर क्षेत्र बढ़ा।
पूर्वोत्तर भारत में भी ताड़ की खेती का विस्तार किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, असम ने इसके लिए 3,75,000 हेक्टेयर क्षेत्र का लक्ष्य रखा है। अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और त्रिपुरा में भी पौधारोपण जारी है। इस अभियान में निजी और सहकारी क्षेत्र की संस्थाएं भी शामिल हैं। गोदरेज एग्रोवेट, पतंजलि फूड्स, 3एफ ऑयल पाम और एपी ऑयलफेड सहित तीन दर्जन से अधिक संस्थाएं प्रसंस्करण मिलों और पौध तैयार करने वाली नर्सरियों का नेटवर्क विकसित करने में जुटी हैं। सरकार की योजना का मुख्य उद्देश्य देश में खाद्य तेल का उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करना है। इसके लिए पारंपरिक तिलहन फसलों के साथ ऑयल पाम की खेती का विस्तार किया जा रहा है।