भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने बिहार और झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में एक नई पहल शुरू की है। इसके तहत जंगलों और पहाड़ों में मिलने वाले औषधीय पौधों को अब किसानों के खेतों में उगाने की योजना पर काम चल रहा है। इस पूरी योजना को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (पूसा, समस्तीपुर) के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दिनेश राय को दी गई है। उनके साथ डॉ. शंकर झा और डॉ. शिवशंकर प्रसाद भी मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। योजना के लिए बिहार के जमुई और झारखंड के दुमका व देवघर के उन गांवों को चुना गया है, जहां आदिवासी समुदाय की आबादी 90 प्रतिशत है। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासी किसानों को पारंपरिक खेती के सीमित दायरे से बाहर निकालकर उनकी कमाई में बढ़ोतरी करना है।
किसानों को मिल रहा प्रशिक्षण और मुफ्त उपकरण
झारखंड के प्राकृतिक जंगलों में सदियों से कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां पाई जाती रही हैं, लेकिन लगातार दोहन से ये खत्म होने की कगार पर हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, इस योजना से इन पौधों को खेतों में उगाकर इनका संरक्षण किया जा सकेगा। वित्तीय वर्ष 2025-26 में शुरू हुई इस योजना में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची सहित स्थानीय संस्थान भी सहयोग कर रहे हैं। योजना के तहत दुमका के करमाटांड और मयूरानाचा के 94 तथा देवघर जिले के चेचाली, जितपुर, अर्जुनपुर, तिलैया और कुशबरिया गांवों के 96 किसानों को औषधीय खेती का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। किसानों की मदद के लिए गांवों में उन्नत किस्म की नर्सरी तैयार की जा रही है। उन्हें लेमनग्रास, मेंथा, अर्जुन, जामुन, बेल और नीम के पौधों के साथ जैविक खाद, कुदाल, खुरपी और तिरपाल जैसे जरूरी उपकरण भी बांटे गए हैं। आगामी नवंबर-दिसंबर महीने में वैज्ञानिकों की टीम फिर से गांवों का दौरा कर नर्सरी प्रबंधन, उचित सिंचाई और कीट नियंत्रण की जानकारी देगी। ज्ञान बढ़ाने के लिए किसानों को पूसा ले जाकर किसान मेले का भ्रमण भी कराया गया है।
महिलाओं ने संभाली कमान, लाखों की कमाई का अनुमान
दुमका जिले के सदर प्रखंड स्थित रामपुर पंचायत के करमाटांड गांव में महिलाओं ने इस खेती की कमान संभाल ली है। पंचायत की 50 महिला किसानों और आधा दर्जन से अधिक परिवारों ने मिलकर करीब पांच एकड़ जमीन पर औषधीय पौधे लगाने शुरू कर दिए हैं। गांव के प्रधान की बेटी स्टेनशीला सोरेन जैसी जागरूक महिलाएं धान कटाई के बाद खाली पड़ी जमीन का इस्तेमाल कर रही हैं। वैज्ञानिकों से प्रशिक्षण लेने के बाद वह पहली बार एक एकड़ खेत में अश्वगंधा और शतावर लगा रही हैं। जानकारों के अनुसार, अश्वगंधा चार से पांच महीने की फसल है, जिसमें प्रति हेक्टेयर 75,000 रुपये का खर्च आता है और दो से ढाई लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हो सकता है। वहीं, शतावर 12 से 18 महीने में तैयार होने वाली फसल है, जिसमें भी 75,000 की लागत पर डेढ़ से दो लाख रुपये तक का लाभ मिलने की संभावना रहती है।
बड़ी कंपनियों से सीधा संपर्क, बिचौलियों से मिलेगी मुक्ति
बाजार में आयुर्वेदिक उत्पादों की लगातार बढ़ती मांग के कारण पतंजलि, हमदर्द, डाबर, बैद्यनाथ आयुर्वेद और हिमालय वेलनेस जैसी बड़ी कंपनियों की नजर झारखंड की इस उपजाऊ भूमि पर टिकी है। परियोजना के अधिकारियों के अनुसार, किसानों को बिचौलियों के शोषण से पूरी तरह बचाने और उपज का सही दाम दिलाने के लिए खरीदारों से सीधा संपर्क कराया जा रहा है। फसलों की सीधी बिक्री के लिए देवघर का सत्संग आश्रम भी प्रबंधन के संपर्क में है। भविष्य में इस परियोजना में एलोवेरा, कालमेघ, आंवला, करंज और अशोक की खेती को भी शामिल किया जाएगा। अधिकारियों के अनुसार, यदि सब कुछ योजना के मुताबिक रहा तो अगले तीन-चार सालों में इन आदिवासी क्षेत्रों के किसानों को एक नई आर्थिक पहचान मिलेगी। फसल का बेहतर दाम दिलाने के लिए जल्द ही किसानों को उपज के प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) का विशेष प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।