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Report: 2015 के बाद कृषि विकास ने पकड़ी तेज रफ्तार, तकनीक से बदली खेती की तस्वीर

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 24 Sep 2026 03:26 PM IST
सार

2015 के बाद भारत की कृषि विकास दर करीब 4.5% रही, जबकि 1967-1995 और 1996-2014 के दौरान यह करीब 3% थी। तकनीक, फसल विविधीकरण, बागवानी, पशुपालन और टिकाऊ खेती ने कृषि विकास को व्यापक बनाया।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारत के कृषि क्षेत्र की विकास दर 2015 के बाद हरित क्रांति के शुरुआती दौर के मुकाबले अधिक रही है। इस दौरान खेती में तकनीक के इस्तेमाल, फसल विविधीकरण और टिकाऊ खेती पर बढ़ते जोर ने कृषि विकास को ज्यादा व्यापक बनाया है। यह जानकारी द इंडियन जर्नल ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (IJAS) में प्रकाशित एक नए शोधपत्र में सामने आई है।

शोधपत्र के मुताबिक, 2015 के बाद कृषि क्षेत्र की औसत विकास दर करीब 4.5 प्रतिशत रही, जबकि इससे पहले के दोनों दौर में यह करीब 3 प्रतिशत थी। शोधकर्ताओं का कहना है कि आने वाले वर्षों में भी 4.5 प्रतिशत की विकास दर बनाए रखने के लिए खेती से जुड़ी पुरानी नीतियों में धीरे-धीरे बदलाव की जरूरत होगी।

कृषि विकास के तीन दौर
‘बियॉन्ड द ग्रीन रिवोल्यूशन: अनरैवलिंग न्यू डायनेमिक्स ऑफ इंडियाज एग्रीफूड सिस्टम ट्रांसफॉर्मेशन’ नाम से प्रकाशित इस शोधपत्र में हरित क्रांति के बाद भारत की कृषि व्यवस्था को तीन दौर में बांटा गया है। 
  • 1967 से 1995: इस दौर में खेती का विकास मुख्य रूप से नई तकनीक के इस्तेमाल और गेहूं-धान जैसी अनाज वाली फसलों का उत्पादन बढ़ाने पर आधारित था।
  • 1996 से 2014: इस दौरान लोगों की बदलती मांग के कारण खेती में विविधीकरण बढ़ा। बागवानी और पशुपालन जैसे क्षेत्रों का महत्व बढ़ा।
  • 2015 के बाद : इस दौर में टिकाऊ खेती, संसाधनों के संरक्षण, नई तकनीक और फसल विविधीकरण पर जोर बढ़ा। कृषि विकास केवल अनाज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई प्रमुख कृषि उत्पादों में देखने को मिला।

पुरानी नीतियों में बदलाव की जरूरत
शोधपत्र में कहा गया है कि हरित क्रांति ने भारत की खाद्य सुरक्षा मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन लंबे समय तक गेहूं और धान पर अधिक जोर देने से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी बढ़ा। उर्वरक और बिजली पर सब्सिडी, भूजल से सिंचाई और गेहूं-धान की सरकारी खरीद जैसी व्यवस्थाओं ने इन फसलों की खेती को बढ़ावा दिया। इसका असर बाजरा, दाल और तिलहन जैसी पोषक फसलों की खेती पर पड़ा और अधिक मूल्य वाली दूसरी फसलों की ओर विविधीकरण की गति भी प्रभावित हुई।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, अब इन प्रोत्साहनों को जल संरक्षण, जलवायु के अनुकूल खेती और टिकाऊ कृषि जैसी नई प्राथमिकताओं से जोड़ने की जरूरत है। इससे उत्पादकता बढ़ाने के साथ किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत किया जा सकेगा।

बागवानी, पशुपालन और मछली पालन भी बढ़े
2015 के बाद बागवानी क्षेत्र ने अपनी विकास गति बनाए रखी। इस दौरान दूध उत्पादन में भी तेजी आई और हर साल दूध उत्पादन में करीब 1 करोड़ टन की बढ़ोतरी दर्ज की गई। मछली पालन और पोल्ट्री उत्पादन में भी तेज विस्तार हुआ। इससे कृषि क्षेत्र का दायरा केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रहा और पशुपालन, मछली पालन तथा अन्य उच्च मूल्य वाली गतिविधियों की हिस्सेदारी बढ़ी।

अनाज उत्पादन में भी तेजी
शोधपत्र के अनुसार, 2015 के बाद खाद्यान्न उत्पादन में भी सालाना करीब 84 लाख टन की बढ़ोतरी हुई। इसका प्रमुख कारण धान और गेहूं की पैदावार में सुधार रहा। धान की उपज की सालाना वृद्धि दर 1996-2014 के दौरान 1.6 प्रतिशत थी, जो 2015-2024 के दौरान बढ़कर 2.1 प्रतिशत हो गई। इसी तरह गेहूं की उपज वृद्धि दर 1.1 प्रतिशत से बढ़कर 2 प्रतिशत हो गई। मक्का की उपज वृद्धि दर भी 2.7 प्रतिशत से बढ़कर 3.4 प्रतिशत रही।

तकनीक के साथ विविध खेती पर जोर
शोधपत्र में कहा गया है कि 2015 के बाद कृषि विकास केवल फसल का रकबा बढ़ाने से नहीं, बल्कि उपज बढ़ाने और अधिक मूल्य वाली कृषि गतिविधियों के विस्तार से भी हुआ है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस दौर में अनाज की पैदावार बढ़ने के साथ बागवानी, पशुपालन, मछली पालन और पोल्ट्री जैसे क्षेत्रों का तेजी से विस्तार हुआ। यही बदलाव कृषि विकास को पहले के मुकाबले अधिक व्यापक बनाता है।

शोधपत्र के लेखक : यह अध्ययन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट, रिसर्च एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर डेवलपिंग कंट्रीज (RIS) के विशिष्ट फेलो प्रताप सिंह बर्थल और इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (IEG) के प्रोफेसर सेदिथिप्पा जनार्धनन बालाजी ने किया है।
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