उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों के लिए एचडी 2967 और पूसा गौतमी (एचडी 3086)
इन किस्मों की खेती पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले, हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले और पांवटा घाटी समेत उत्तराखंड के तराई क्षेत्रों में की जा सकती है। इसके अलावा, राजस्थान में कोटा व उदयपुर संभाग को छोड़कर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में झांसी संभाग को छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों में किसान इनकी खेती कर सकते हैं।
सिंचाई की सुविधा वाले इलाकों में समय पर बुवाई के लिए ये दोनों किस्में उपयुक्त हैं। बुवाई के 143 दिनों में फसल पककर तैयार होती है। पैदावार की बात करें तो किसान इन दोनों किस्मों से औसतन 5.456 टन प्रति हेक्टेयर की उपज हासित कर सकते हैं।
देर से बुवाई के लिए बेहतरीन है पूसा अमूल्य (एचडी 3090)
एचडी 3090 किस्म को पूसा अमूल्य के नाम से भी जाना जाता है। यह किस्म महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गोवा और तमिलनाडु के मैदानी इलाकों के लिए जारी की गई है। यह किस्म उन किसानों के लिए अच्छी है जो सिंचित परिस्थितियों में गेहूं की देर से बुवाई करते हैं।
पूसा अमूल्य एक जल्दी पकने वाली और अधिक तापमान को आसानी से सहने वाली किस्म है। 101 दिन में पककर तैयार होने वाली यह किस्म 4.21 टन प्रति हेक्टेयर की औसत उपज दे सकती है, लेकिन इसकी क्षमता 6.31 टन प्रति हेक्टेयर तक बताई जाती है। जानकारों के अनुसार, यह किस्म पत्ती रतुआ और तना रतुआ जैसी बीमारियों से लड़ने की उच्च क्षमता होती है। गुणवत्ता के मामले में भी यह काफी अच्छी है। इसमें 13.3 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है, जिसके कारण यह किस्म ब्रेड और चपाती (रोटी) बनाने के लिए बहुत उपयुक्त मानी जाती है।