चालू रबी सीजन में चने की बुवाई आगामी साल में दालों की महंगाई की दिशा तय कर सकती है। सीमित पानी और अल नीनो की वजह से चने की बुवाई पर खतरे के बादल हैं। अगर बुवाई कम हुई, तो दालों के लिए भारत की विदेश पर निर्भरता बढ़ सकती है।
चने की अहमियत और कीमतों में भारी उछाल
चना खपत के नजरिए से काफी अहम दाल है। दालों की कुल खपत में चने का हिस्सा लगभग 45 से 50 प्रतिशत है, जिसके बाद 15-20 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ तुअर का नाम आता है। आंकड़ों के अनुसार, थोक बाजार में चना एक साल पहले के मुकाबले 30 प्रतिशत तक महंगा हो गया है। वहीं, तुअर, उड़द और पीली मटर जैसी अन्य दालों की कीमतों में भी 35 से 45 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
बारिश की कमी और सरकार की एडवाइजरी
देश के कुछ हिस्सों में चने की बुवाई शुरू हो गई है, लेकिन इसकी रफ्तार काफी धीमी है। पानी की कमी को देखते हुए राज्य सरकारों की ओर से एडवाइजरी जारी की गई है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने किसानों को सलाह दी है कि जिन क्षेत्रों में पीने के पानी को बचाने की जरूरत है, वहां किसान रबी की फसल न बोएं। इसी तरह, राजस्थान और कर्नाटक की सरकारों के अनुसार भी किसानों को कम पानी वाली फसलें चुनने की सलाह दी गई है।
उत्पादन में गिरावट और बफर स्टॉक का हाल
मानसून की कमी से उड़द और मूंग (खरीफ फसलों) के उत्पादन में गिरावट आई है, जिससे इनकी कीमतें बढ़ी हैं। इसके अलावा, नवंबर में कटने वाली तुअर की पैदावार घटने की भी आशंका है। ऐसे में दालों की महंगाई को काबू में रखने के लिए चने का अच्छा उत्पादन बेहद जरूरी है।
सरकार के बफर स्टॉक से होने वाली चने की नीलामी कीमतों में पिछले दो महीनों में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। महाराष्ट्र के लातूर में दालों के कारोबारी नितिन कलांत्री के अनुसार, "पिछले दो महीनों में चने की कीमतें मुख्य रूप से अक्टूबर में बारिश न होने के कारण बढ़ी हैं। हालांकि, चने की बुवाई के लिए अभी भी एक महीने से अधिक का समय बचा है।"
दाल उगाने वाले देशों की भारत पर नजर
भारत की कृषि पर अल नीनो का असर गहराता जा रहा है। इसका फायदा उठाने के लिए दालों का उत्पादन करने वाले प्रमुख देशों के उद्योगपति और सरकारी प्रतिनिधिमंडल भारत का रुख कर रहे हैं। चूंकि भारत दालों का सबसे बड़ा उपभोक्ता (खपत करने वाला) देश है, ऐसे में विदेशी देशों को यहां अपना निर्यात बढ़ाने की उम्मीद है।