देश में रबी फसलों की बुवाई इस समय पिछले साल के मुकाबले करीब 46 फीसदी पीछे चल रही है। हालांकि, कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अभी बुवाई में तेजी लाकर इस अंतर को कम किया जा सकता है। इसके लिए अगले 15 से 20 दिन काफी अहम होंगे। खासकर सरसों और चने की खेती करने वाले किसानों के लिए मौसम में बदलाव फायदेमंद हो सकता है। तापमान में गिरावट से खेतों में बुवाई का काम तेज होने की उम्मीद है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक एमएल जाट के मुताबिक, मौसम में लगातार बदलाव हो रहा है। रबी सीजन के लिए जिलावार कृषि योजनाओं में भी जरूरत के हिसाब से बदलाव किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगले 15-20 दिन बुवाई की रफ्तार बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। पिछले साल के मुकाबले अभी बुवाई कम होने का मतलब यह नहीं है कि इस बार कुल रकबा भी कम रहेगा। हर साल स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से बुवाई का समय बदलता रहता है।
सरसों की खेती का रकबा बढ़ने की उम्मीद
एमएल जाट ने भरोसा जताया कि इस साल सरसों की खेती का रकबा बढ़ सकता है। उनके मुताबिक, दलहन और तिलहन फसलों की बुवाई में फिलहाल कोई बड़ी समस्या नहीं है। इसलिए अभी उत्पादन या बुवाई को लेकर किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। उन्होंने बताया कि सरसों की खेती अब राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के पारंपरिक इलाकों से आगे बढ़कर दूसरे क्षेत्रों में भी फैल रही है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 30 अक्टूबर तक देश में सरसों की बुवाई करीब 21 लाख हेक्टेयर में हुई थी। यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 46 फीसदी कम है।
राजस्थान में सरसों की बुवाई 37% घटी
देश में सरसों के सबसे बड़े उत्पादक राज्य राजस्थान में भी बुवाई की रफ्तार धीमी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2 नवंबर तक राज्य में 16.86 लाख हेक्टेयर में सरसों की बुवाई हुई थी, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 26.62 लाख हेक्टेयर था। यानी इस साल बुवाई का रकबा करीब 37 फीसदी कम है। राजस्थान में अभी सरसों की खेती के लक्ष्य का केवल 45 फीसदी हिस्सा ही पूरा हुआ है। पिछले साल इसी समय तक 74 फीसदी बुवाई हो चुकी थी।
गौरतलब है कि वर्ष 2025-26 में देश में सरसों का रिकॉर्ड 137.68 लाख टन उत्पादन हुआ था। इसकी खेती 94.27 लाख हेक्टेयर में की गई थी। कुल उत्पादन में राजस्थान की हिस्सेदारी करीब 42 फीसदी और उत्तर प्रदेश की 19 फीसदी थी।
कहीं ज्यादा तो कहीं कम बारिश बनी चुनौती
इस बार सरसों और गेहूं की खेती वाले इलाकों में बारिश का अलग-अलग असर देखने को मिल रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 1 अक्टूबर से अब तक सामान्य से 34 फीसदी ज्यादा बारिश हुई है। वहीं, पूर्वी राजस्थान में सामान्य से 28 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। मध्य प्रदेश में भी सरसों की खेती वाले इलाकों में बारिश की कमी चिंता का विषय है। राज्य के पूर्वी हिस्से में सामान्य से 71 फीसदी और पश्चिमी हिस्से में 83 फीसदी कम बारिश हुई है।
राज्य के अधिकारियों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में सरसों की बेहतर पैदावार के लिए सामान्य तौर पर 31 अक्टूबर तक बुवाई पूरी हो जानी चाहिए। यहां फरवरी से तापमान बढ़ने लगता है। ऐसे में बुवाई में देरी होने पर फसल की पैदावार प्रभावित हो सकती है।
देश में जल्द लागू हो सकती है मृदा स्वास्थ्य नीति
इस बीच ICAR के महानिदेशक एमएल जाट ने बताया कि अगले 2-3 महीनों में सरकार मृदा स्वास्थ्य नीति लागू कर सकती है। इस नीति का पहला मसौदा ICAR तैयार कर चुका है। इस नीति के तहत देशभर में एक लाख मृदा स्वास्थ्य उद्यमी (Soil Health Entrepreneurs) तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे किसानों को मिट्टी की जांच, उसकी सेहत सुधारने और खेती के लिए जरूरी सलाह उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।
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