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Study: नई फैक्ट्री लगाए बिना बढ़ सकता है प्रोटीन उत्पादन, भारत के पास 2.64 करोड़ किलोलीटर खाली क्षमता

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 17 Oct 2026 12:23 PM IST
सार

  • 19.8 करोड़ किलोलीटर क्षमता: भारत में स्मार्ट प्रोटीन उत्पादन के लिए प्रासंगिक औद्योगिक किण्वन क्षमता का अध्ययन में आकलन।

  • 2.643 करोड़ किलोलीटर खाली क्षमता: मौजूदा औद्योगिक ढांचे के बेहतर इस्तेमाल की संभावना।

  • 478 इकाइयों का अध्ययन: 17 राज्यों में बायोमैन्युफैक्चरिंग के नौ क्षेत्रों को शामिल किया गया।

  • दो प्रमुख तकनीकें: प्रिसिजन फर्मेंटेशन और बायोमास फर्मेंटेशन से प्रोटीन उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारत में स्मार्ट प्रोटीन के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए पहले से मौजूद औद्योगिक ढांचे का इस्तेमाल किया जा सकता है। एक अध्ययन के मुताबिक, देश में ऐसे उद्योगों की कुल 19.8 करोड़ किलोलीटर किण्वन क्षमता (फर्मेंटर कैपेसिटी) है, जिसका उपयोग स्मार्ट प्रोटीन और उससे जुड़े खाद्य उत्पाद बनाने में किया जा सकता है। इसमें से करीब 2.643 करोड़ किलोलीटर क्षमता फिलहाल खाली है। इस क्षमता का बेहतर इस्तेमाल होने पर प्रोटीन से जुड़े नए उत्पाद विकसित करने, उद्योगों की कमाई बढ़ाने और टिकाऊ पोषण के विकल्प तैयार करने में मदद मिल सकती है।

सथगुरु मैनेजमेंट कंसल्टेंट्स (SMC) और गुड फूड इंस्टीट्यूट इंडिया (GFI India) के अध्ययन ‘मैपिंग इंडियाज बायोमैन्युफैक्चरिंग पोटेंशियल फॉर स्मार्ट प्रोटीन्स’ में यह आकलन किया गया है। रिपोर्ट में देश के 17 राज्यों में बायोमैन्युफैक्चरिंग से जुड़े नौ क्षेत्रों की 478 इकाइयों का अध्ययन किया गया है।

खाली औद्योगिक क्षमता से बन सकते हैं प्रोटीन उत्पाद
रिपोर्ट के मुताबिक, दवा, एंजाइम, औद्योगिक किण्वन, शराब, बीयर, वाइन, प्रोबायोटिक्स और यीस्ट जैसे क्षेत्रों में पहले से मौजूद ढांचे का इस्तेमाल स्मार्ट प्रोटीन बनाने में किया जा सकता है। इससे कंपनियों को नए कारोबार शुरू करने और कम इस्तेमाल हो रही उत्पादन क्षमता से अतिरिक्त कमाई करने का अवसर मिल सकता है। स्मार्ट प्रोटीन ऐसे प्रोटीन विकल्पों को कहा जाता है, जिन्हें पारंपरिक पशुपालन पर निर्भरता कम करने वाले तरीकों से बनाया जा सकता है। इनमें किण्वन तकनीक से तैयार होने वाले प्रोटीन भी शामिल हैं।

दो तरीकों से तैयार किए जा सकते हैं प्रोटीन
रिपोर्ट में प्रोटीन उत्पादन के लिए किण्वन की दो तकनीकों की संभावनाओं का आकलन किया गया है।

1. प्रिसिजन फर्मेंटेशन (Precision Fermentation): इस तकनीक में सूक्ष्मजीवों की मदद से खास प्रोटीन या उपयोगी तत्व तैयार किए जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑर्गनाइजेशन (CDMO), बायोफार्मास्यूटिकल और एंजाइम क्षेत्रों में करीब 7,737 किलोलीटर खाली क्षमता इस तकनीक के लिए उपयोगी हो सकती है।

2. बायोमास फर्मेंटेशन (Biomass Fermentation): इसमें सूक्ष्मजीवों की मदद से प्रोटीन से भरपूर बायोमास तैयार किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, डिस्टिलरी, बीयर, वाइन, प्रोबायोटिक्स और यीस्ट जैसे पांच खाद्य-उपयोग वाले क्षेत्रों में करीब 27.4 लाख किलोलीटर खाली क्षमता इस तकनीक के लिए प्रासंगिक है।

हालांकि, हर औद्योगिक इकाई को स्मार्ट प्रोटीन उत्पादन के लिए सीधे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसके लिए मशीनों में बदलाव, तकनीकी उपयुक्तता और खाद्य सुरक्षा मानकों का ध्यान रखना होगा। इन जरूरतों के आधार पर अलग-अलग उद्योगों में उत्पादन शुरू करने की समय-सीमा भी अलग हो सकती है।

कम क्षमता के इस्तेमाल से भी बड़ा बाजार
अध्ययन में यह भी अनुमान लगाया गया है कि खाली उत्पादन क्षमता के छोटे हिस्से का इस्तेमाल करके भी बड़े बाजार की मांग पूरी करने की संभावना हो सकती है। रिपोर्ट के मॉडल के अनुसार, प्रिसिजन फर्मेंटेशन के लिए उपयुक्त खाली क्षमता का 20 फीसदी हिस्सा लैक्टोफेरिन बनाने में इस्तेमाल किया जाए, तो इससे 2025 में इसके अनुमानित वैश्विक बाजार की करीब 63.5 करोड़ डॉलर की मांग के बराबर उत्पादन संभव हो सकता है।

इसी तरह, बायोमास फर्मेंटेशन के लिए उपयुक्त खाली क्षमता का केवल 0.2 फीसदी इस्तेमाल करके यीस्ट प्रोटीन का इतना उत्पादन किया जा सकता है, जो 2025 में इसके अनुमानित 34.7 करोड़ डॉलर के वैश्विक बाजार के बराबर हो। ये रिपोर्ट के मॉडल पर आधारित अनुमान हैं, वास्तविक उत्पादन या बिक्री की गारंटी नहीं। इनके लिए तकनीकी क्षमता, लागत, निवेश और बाजार की मांग का पूरा आकलन जरूरी होगा।

यीस्ट प्रोटीन में भारत के लिए अवसर
रिपोर्ट के मुताबिक, यीस्ट प्रोटीन की बढ़ती मांग को देखते हुए भारत इस क्षेत्र में शुरुआती बढ़त हासिल कर सकता है। मौजूदा औद्योगिक ढांचे का इस्तेमाल करने से नए संयंत्रों पर होने वाला शुरुआती खर्च कम करने में मदद मिल सकती है, हालांकि इसके लिए जरूरी तकनीकी बदलाव करने होंगे।

गुड फूड इंस्टीट्यूट इंडिया की प्रबंध निदेशक स्नेहा सिंह ने कहा कि स्मार्ट प्रोटीन के बड़े पैमाने पर उत्पादन में अधिक पूंजी और व्यावसायिक स्तर के संयंत्रों की कमी जैसी चुनौतियां हैं। भारत की मौजूदा उत्पादन क्षमता घरेलू और अंतरराष्ट्रीय खाद्य एवं पोषण बाजारों के लिए कम लागत में उत्पादन बढ़ाने का रास्ता खोल सकती है। इससे देश की जैव-अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिल सकता है।
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