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खेत बने पाठशाला, किसान बने गुरु: 6000 किसानों तक पहुंची आलू की खेती की नई तकनीक, ऐसे बचा रहे लागत

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 17 Oct 2026 12:13 PM IST
सार

  • खेती की लागत में 10–12% तक बचत: हाइफार्म के अनुसार, कार्यक्रम से जुड़े किसानों ने कुल लागत में इतनी कमी दर्ज की।

  • खाद पर 15% तक कम खर्च: संतुलित उर्वरक इस्तेमाल से लागत घटाने में मदद मिली।

  • सिंचाई के पानी में 30–35% तक बचत: बेहतर सिंचाई प्रबंधन पर जोर।

  • 6,000 से अधिक किसानों तक पहुंच: प्रशिक्षित किसान दूसरे किसानों को भी खेती के बेहतर तरीके सिखा रहे हैं।

आलू की खेती
आलू की खेती - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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आलू की खेती की लागत घटाने और फसल की गुणवत्ता सुधारने के लिए किसानों को उन्नत तकनीकों से जोड़ने की पहल रंग ला रही है। एग्रीबिजनेस कंपनी हाइफन फूड्स की इकाई हाइफार्म के मुताबिक, उसके प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़े किसानों ने खेती की कुल लागत में करीब 10 से 12 फीसदी तक की बचत की है। वहीं, खाद की लागत में लगभग 15 फीसदी और सिंचाई के पानी के इस्तेमाल में 30 से 35 फीसदी तक की कमी दर्ज की गई है। इस पहल के तहत किसान खुद खेती के नए तरीके सीखने के साथ दूसरे किसानों को भी प्रशिक्षित कर रहे हैं।

हाइफार्म ने अपने दूसरे ‘हाइफार्म पाठशाला दीक्षांत समारोह’ में ऐसे किसानों को ‘फार्मर चैंपियन’ के रूप में सम्मानित किया, जिन्होंने अपने खेतों में उन्नत खेती के तरीकों का प्रदर्शन किया और आसपास के किसानों को भी इन्हें अपनाने के लिए प्रेरित किया।

33 प्रदर्शन खेतों पर दिया जा रहा प्रशिक्षण
हाइफार्म पाठशाला खेतों में प्रशिक्षण देने वाला कार्यक्रम है। इसके तहत किसानों को आलू की खेती के बेहतर तरीके सिखाए जाते हैं। कार्यक्रम गुजरात के साबरकांठा और बनासकांठा जिलों में 17 माइक्रो क्लस्टर और 33 प्रदर्शन खेतों के माध्यम से चलाया जा रहा है।

इसमें किसानों के पारंपरिक अनुभव को आधुनिक कृषि तकनीकों के साथ जोड़ा जाता है। किसानों को पूरे फसल सीजन के दौरान मार्गदर्शन दिया जाता है, ताकि खेती की लागत घटाने, आलू की गुणवत्ता सुधारने और प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिल सके।

कार्यक्रम की खास बात यह है कि प्रशिक्षण लेने वाले किसान अपने खेतों में सीखी गई तकनीकों को अपनाते हैं और उनके नतीजे दूसरे किसानों के सामने रखते हैं। इसके बाद वे खुद प्रशिक्षक और मार्गदर्शक बनकर आसपास के गांवों के किसानों तक जानकारी पहुंचाते हैं। कंपनी के अनुसार, इस पहल से अब तक 6,000 से अधिक किसान जुड़े हैं।

खाद और पानी की बचत पर जोर
कार्यक्रम के तहत किसानों को मिट्टी की जांच के आधार पर खाद का इस्तेमाल करने, संतुलित मात्रा में उर्वरक देने, आलू की सही तरीके से बुवाई करने और जरूरत के मुताबिक सिंचाई करने की सलाह दी जाती है। फसल की नियमित निगरानी भी की जाती है।

कंपनी के मुताबिक, इन तरीकों को अपनाने वाले किसानों ने खेती की कुल लागत में करीब 10 से 12 फीसदी तक बचत दर्ज की है। खाद पर खर्च लगभग 15 फीसदी घटा है, जबकि सिंचाई के पानी की खपत में 30 से 35 फीसदी तक कमी आई है। इन उपायों का उद्देश्य मिट्टी की उत्पादकता बनाए रखने और प्रोसेसिंग के लिए उपयुक्त गुणवत्ता वाले आलू का उत्पादन बढ़ाने में मदद करना है।

अनुभवी किसानों के साथ युवा और महिलाएं भी शामिल
हाइफार्म पाठशाला से जुड़े किसानों में अनुभवी किसानों के साथ युवा और महिला किसान भी शामिल हैं। इन किसानों ने अपने खेतों को प्रदर्शन के लिए उपलब्ध कराया और कंपनी की ओर से सुझाए गए खेती के तरीकों को अपनाया। अब वे अपने अनुभव दूसरे किसानों के साथ साझा कर रहे हैं, जिससे गांवों में खेती की नई तकनीकों को अपनाने को बढ़ावा मिल रहा है।

हाइफार्म के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदरराजने एस ने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य पारंपरिक खेती के अनुभव और आधुनिक कृषि विज्ञान को जोड़कर किसानों की लागत घटाना, संसाधनों की बचत करना और फसल की गुणवत्ता व मुनाफा बढ़ाने में मदद करना है। उन्होंने कहा कि अनुभवी, युवा और महिला किसानों का प्रशिक्षक बनना इस पहल की बड़ी उपलब्धि है।

वहीं, सीआईपी दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र के निदेशक और दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय निदेशक सुधांशु सिंह ने कहा कि पाठशाला से जुड़े किसान खेती को नवाचार, बेहतर उत्पादकता और आमदनी बढ़ाने के अवसरों से जोड़ रहे हैं। उनके मुताबिक, किसान जब एक-दूसरे से सीखते हैं और अपने अनुभव साझा करते हैं, तो इसका लाभ दूसरे खेतों और पूरे समुदाय तक पहुंच सकता है।
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