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पराली जलाने में मध्य प्रदेश सबसे आगे: एक महीने में दोगुने से ज्यादा बढ़ीं घटनाएं, यूपी में आधे से भी कम

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 17 Oct 2026 08:46 AM IST
सार

  • मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा घटनाएं: 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच पराली जलाने के 350 मामले दर्ज हुए, जबकि पिछले साल 138 मामले थे।

  • देशभर में बढ़े मामले: इस अवधि में कुल 793 घटनाएं सामने आईं, जबकि पिछले साल यह संख्या 724 थी।

  • उत्तर प्रदेश में आई कमी: पराली जलाने की घटनाएं 271 से घटकर 134 रह गईं।

  • पंजाब में मामूली बढ़ोतरी: पिछले साल के 176 मामलों के मुकाबले इस बार 185 घटनाएं दर्ज की गईं।

पराली की आग (फाइल फोटो)
पराली की आग (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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उत्तर भारत में वायु प्रदूषण बढ़ने के बीच मध्य प्रदेश में पराली जलाने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के आंकड़ों के मुताबिक, 15 सितंबर से 15 अक्टूबर 2026 के बीच मध्य प्रदेश में पराली जलाने की 350 घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 138 थी। इस बढ़ोतरी के साथ मध्य प्रदेश पराली जलाने के मामलों में देश में सबसे आगे पहुंच गया है।

IARI के अंतरिक्ष से कृषि गतिविधियों की निगरानी करने वाले कंसोर्टियम (CREAMS) के अनुसार, इस साल 15 अक्टूबर तक देश के विभिन्न राज्यों में पराली जलाने की कुल 793 घटनाएं दर्ज की गईं। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 724 था। संस्थान 30 नवंबर तक रोजाना इन घटनाओं की निगरानी करता है।

पंजाब में लगभग स्थिर, यूपी में घटनाएं घटीं
आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में इस साल 15 अक्टूबर तक पराली जलाने की 185 घटनाएं दर्ज हुईं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 176 मामले सामने आए थे। वहीं, उत्तर प्रदेश में घटनाओं की संख्या 271 से घटकर 134 रह गई।

राजस्थान में पराली जलाने के मामले 75 से बढ़कर 99 हो गए। दूसरी ओर, हरियाणा में इस साल अब तक आठ घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 25 मामले सामने आए थे। उत्तराखंड में भी घटनाएं 36 से घटकर 16 रह गईं। दिल्ली में अब तक पराली जलाने का केवल एक मामला दर्ज हुआ है। यह घटना 19 सितंबर को शहर के उत्तरी हिस्से में हरियाणा की सीमा के पास सामने आई थी।

धान की कटाई तेज होने पर बढ़ सकती है चुनौती
विशेषज्ञों के मुताबिक, पराली जलाने की घटनाओं का सीधा संबंध धान की कटाई से है। धान की रोपाई का समय, फसल पकने की अवधि और स्थानीय मौसम जैसे कारणों से हर साल इन घटनाओं की संख्या में बदलाव होता है। इसलिए पिछले साल के आंकड़ों से सीधी तुलना करना हमेशा सही तस्वीर नहीं दिखाता। इस साल सितंबर में हुई बारिश और उसके बाद आई बाढ़ के कारण उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में धान की कटाई में देरी हुई है। ऐसे में आने वाले दिनों में कटाई तेज होने पर पराली जलाने की घटनाएं बढ़ने की आशंका है।

एक विशेषज्ञ के मुताबिक, दिवाली के बाद धान की कटाई में तेजी आने पर असली चुनौती सामने आएगी। इस साल दिवाली 8 नवंबर को मनाई जाएगी। उस समय उत्तर भारत में सर्दी भी बढ़ने लगेगी और पंजाब तथा हरियाणा में गेहूं की बुवाई की तैयारी शुरू हो जाएगी।

धान की कटाई में देरी होने पर किसानों के पास खेत खाली करने और गेहूं की बुवाई के लिए कम समय बचता है। खेत से फसल अवशेष हटाने में लगने वाली लागत और मजदूरों की कमी भी किसानों को पराली जलाने की ओर धकेल सकती है।

मध्य प्रदेश और राजस्थान के लिए विशेष कार्ययोजना
पराली जलाने की घटनाओं में बढ़ोतरी पर चिंता जताते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 13 अक्टूबर को मध्य प्रदेश और राजस्थान सरकारों को प्रभावित जिलों और गांवों की पहचान करने तथा तत्काल विशेष कार्ययोजना लागू करने के निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा था कि जिन राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं कम हुई हैं, उन्हें भी ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए। धान की कटाई का काफी काम अभी बाकी है, इसलिए निगरानी लगातार जारी रहनी चाहिए।

केंद्रीय कृषि मंत्री और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की संयुक्त बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहें, बल्कि जमीन पर उतरकर तुरंत कार्रवाई करें। जिला कलेक्टरों को बैठकें करने, निगरानी मजबूत करने और किसानों की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान लागू करने के लिए कहा गया।

पराली प्रबंधन के लिए 3.54 लाख से ज्यादा मशीनें दीं
केंद्र सरकार के मुताबिक, राज्यों को अब तक फसल अवशेष प्रबंधन के लिए 3.54 लाख से अधिक मशीनें उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। इनमें चालू वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान दी गई 26,109 नई मशीनें भी शामिल हैं।

फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत केंद्र ने 2026-27 में राज्यों के लिए निर्धारित 592.57 करोड़ रुपये में से अब तक 430.87 करोड़ रुपये जारी किए हैं। इस योजना का उद्देश्य किसानों को पराली के बेहतर प्रबंधन के लिए मशीनें और अन्य सहायता उपलब्ध कराना है।

कम समय में पकने वाली धान की किस्मों पर जोर
शिवराज सिंह चौहान ने किसानों को कम अवधि में पकने वाली धान की किस्में अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने पर भी जोर दिया है। इनमें पूसा-2090 और पीआर-126 जैसी किस्में शामिल हैं। इनकी जगह लंबे समय में पकने वाली पूसा-44 जैसी किस्मों का इस्तेमाल कम करने की सलाह दी गई है।

कम अवधि में तैयार होने वाली धान की फसल की कटाई जल्दी हो सकती है। इससे किसानों को खेत से फसल अवशेष हटाने और गेहूं की बुवाई के लिए अधिक समय मिलेगा। सरकार का मानना है कि फसल की अवधि कम करने और पराली प्रबंधन के बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने से खेतों में आग लगाने की घटनाओं को कम करने में मदद मिल सकती है।
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