केंद्र सरकार साल 2030 तक भारत की सालाना यूरिया उत्पादन क्षमता में 13.7 मिलियन टन की बढ़ोतरी करने की योजना बना रही है। इस तरह देश की कुल घरेलू क्षमता बढ़कर लगभग 43.7 मिलियन टन हो जाएगी। इसका मकसद विदेश से यूरिया आयात पर निर्भरचा को कम करना और दुनिया भर में खाद की कीमतों उतार-चढ़ाव से बचाना है।
हर साल 5 प्रतिशत बढ़ रही यूरिया मांग
वर्तमान में भारत की सालाना यूरिया मांग लगभग 40 मिलियन टन है, जो हर साल करीब 5% की दर से बढ़ रही है। फिलहाल, देश का अपना उत्पादन जरूरत का लगभग 75% ही पूरा कर पाता है, और बाकी यूरिया विदेशों से आयात करना पड़ता है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर खाद की कीमतें बढ़ रही हैं, इसलिए आयात पर यह निर्भरता कम करना और भी जरूरी हो गया है।
अनुमान है कि 2030 तक देश की कुल यूरिया मांग 48.61 मिलियन टन हो जाएगी। ऐसे में 43.5 से 43.7 मिलियन टन के घरेलू उत्पादन से देश की 90% मांग अपने आप पूरी हो सकेगी।
विदेशी मुद्रा की बचत और नई निवेश नीति
जानकारों के अनुसार, हर 1 मिलियन टन यूरिया का घरेलू उत्पादन सालाना लगभग 500 मिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा बचा सकता है। इस भारी बचत से केंद्र सरकार पर पड़ने वाला खाद सब्सिडी का बोझ भी काफी हद तक कम हो सकता है।
जानकारों के अनुसार, हमें उम्मीद है कि 2030 तक 13.5 से 13.7 मिलियन टन अतिरिक्त यूरिया उत्पादन क्षमता चालू हो जाएगी।" इस विस्तार में 10 मिलियन टन की अतिरिक्त क्षमता राष्ट्रीय यूरिया निवेश नीति-2026 के तहत लगाई जाएगी। पश्चिम एशिया विवाद की वजह से खाद की कीमतें बढ़ने के बाद केंद्रीय कैबिनेट ने इस नीति को मंजूरी दी है। इसके अलावा 1.27 मिलियन टन के दो घरेलू प्रोजेक्ट और एक रूसी खाद उत्पादक कंपनी के साथ एक प्रस्तावित प्रोजेक्ट भी इस योजना का हिस्सा है।
12 यूरिया प्लांट लगाने के प्रस्ताव सामने
हाल ही में सामने आया था कि उर्वरक विभाग को नए यूरिया प्लांट लगाने के लिए 17 प्रस्ताव मिले हैं। ये प्रस्ताव गेल, हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड, कृभको, चंबल फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स और मैटिक्स फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स जैसी कंपनियों ने दिए हैं। विभाग अभी इन नए (ग्रीनफील्ड) और पुराने कारखानों के विस्तार (ब्राउनफील्ड) के प्रस्तावों की जांच कर रहा है।
ओडिशा में लग रहा नया कारखाना
मौजूदा परियोजनाओं में, तलचर फर्टिलाइजर्स लिमिटेड ओडिशा में एक नया यूरिया प्लांट लगा रही है। यह प्लांट कोयला गैसीकरण तकनीक से चलेगा और इसकी क्षमता 1.27 मिलियन टन होगी। कोल इंडिया केअनुसार, इस प्रोजेक्ट पर अनुमानित 19,000 करोड़ रुपये की लागत आएगी और इसके वित्त वर्ष 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है। इसी तरह, असम वैली फर्टिलाइजर एंड केमिकल कंपनी लिमिटेड भी असम में 1.27 मिलियन टन क्षमता वाला प्लांट लगा रही है।
इस पूरे मामले को लेकर 12 अक्टूबर को उर्वरक विभाग, गेल, आरसीएफ, फर्टिलाइजर्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, असम वैली फर्टिलाइजर एंड केमिकल कंपनी, ऑयल इंडिया, नेशनल फर्टिलाइजर्स और ब्रह्मपुत्र वैली फर्टिलाइजर कॉर्प को सवाल भेजे गए थे, लेकिन खबर छपने तक इनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला है।