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मूंगफली, सोयाबीन और तिल पर नजर : भारत-मोजांबिक के बीच बनेगा तिलहन और खाद्य तेल का नया कॉरिडोर

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 01 Oct 2026 08:11 PM IST
सार

SEA और मोजांबिक के नम्पुला प्रांत ने तिलहन और खाद्य तेल की आपूर्ति की संभावनाएं तलाशने के लिए समझौता किया। तीन साल तक फसल, किसान, निवेश, लागत और परिवहन व्यवस्था का अध्ययन होगा।

खाद्य तेल
खाद्य तेल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारत में खाद्य तेल उद्योग के संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) और मोजांबिक के उत्तरी प्रांत नम्पुला की सरकार ने तिलहन और खाद्य तेल की आपूर्ति के लिए एक नए कॉरिडोर की संभावनाएं तलाशने पर सहमति जताई है। दोनों पक्षों ने ‘स्टेटमेंट ऑफ इंटरेस्ट’ पर हस्ताक्षर किए हैं। इसका उद्देश्य नम्पुला से भारत तक टिकाऊ तरीके से तिलहन और वनस्पति तेल की आपूर्ति की संभावनाओं का अध्ययन करना है।

इस साझेदारी में सॉलिडेरिडाड नेटवर्क एशिया और सॉलिडेरिडाड सदर्न अफ्रीका भी भागीदार हैं। इनका काम यह सुनिश्चित करना होगा कि परियोजना में किसानों को उचित लाभ मिले और खेती के लिए जंगलों की कटाई न हो।

तीन साल तक संभावनाओं का अध्ययन
मुंबई में बुधवार को आयोजित ग्लोबऑयल इंडिया 2026 के दौरान समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इसके तहत अगले तीन वर्षों में तिलहन उत्पादन, निवेश और भारत को आपूर्ति की संभावनाओं का अध्ययन किया जाएगा। इसके बाद ही व्यावसायिक स्तर पर निवेश और खरीद से जुड़े फैसले लिए जाएंगे।

नम्पुला मोजांबिक का प्रमुख कृषि क्षेत्र है। यहां की जमीन और जलवायु कई तरह की तिलहन फसलों के लिए अनुकूल है। छोटे किसान पहले से मूंगफली, सोयाबीन और तिल जैसी फसलें उगाते हैं। नम्पुला नाकाला डेवलपमेंट कॉरिडोर से जुड़ा है और यहां सड़क व रेल के जरिए हिंद महासागर स्थित नाकाला बंदरगाह तक पहुंच है। इससे भारत के पश्चिमी तट तक समुद्री परिवहन अपेक्षाकृत कम दूरी का हो सकता है।

किसान और निवेश पर रहेगा फोकस
नम्पुला सरकार जमीन, पानी, कृषि क्षेत्र और बुनियादी ढांचे से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराएगी। साथ ही जमीन के इस्तेमाल, निवेश मंजूरी और पर्यावरण संबंधी अनुमति की प्रक्रिया की जानकारी भी साझा करेगी। स्थानीय प्रशासन, सहकारी समितियों और कारोबारियों से संपर्क कराने में भी मदद करेगी।

SEA भारतीय उद्योग की जरूरत के मुताबिक तिलहन, कच्चे और रिफाइंड खाद्य तेल तथा खली की मांग और गुणवत्ता मानकों की जानकारी देगा। संगठन मोजांबिक में खेती, किसानों से उपज एकत्र करने, तेल निकालने और रिफाइनिंग में भारतीय कंपनियों के निवेश की संभावनाएं भी तलाशेगा।

पर्यावरण और किसानों की सुरक्षा पर जोर
सॉलिडेरिडाड के दोनों संगठन किसानों के भूमि अधिकार, मिट्टी और पानी के बेहतर प्रबंधन, जंगलों की सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से जुड़े मुद्दों पर सलाह देंगे। साथ ही तिलहन की आपूर्ति में पारदर्शिता और उत्पाद कहां से आया, इसकी जानकारी रखने यानी ट्रेसबिलिटी पर भी काम किया जाएगा।

तय होगा कौन-सी फसल और कितना उत्पादन
संयुक्त कार्य समूह यह अध्ययन करेगा कि नम्पुला में कौन-सी तिलहन फसलें बड़े स्तर पर उगाई जा सकती हैं और वहां से भारत को कितनी मात्रा में तेल या तिलहन उपलब्ध कराया जा सकता है। इसके अलावा सड़क, रेल, भंडारण और बंदरगाह की क्षमता, किसानों को वित्तीय सहायता, बाजार, लागत और फसल से जुड़े स्वास्थ्य एवं गुणवत्ता नियमों का भी अध्ययन होगा।

SEA के अध्यक्ष अंग्शु मलिक ने कहा कि भारत को खाद्य तेल के लिए कुछ चुनिंदा देशों पर निर्भरता कम करने की जरूरत है। उनके अनुसार, अफ्रीका भारत की खाद्य तेल सुरक्षा के लिए नए स्रोत के रूप में महत्वपूर्ण हो सकता है और नम्पुला इस दिशा में एक संभावित शुरुआत है।

SEA के कार्यकारी निदेशक बीवी मेहता ने कहा कि नए स्रोत से लगातार उपलब्धता, तय गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी लागत जरूरी है। नम्पुला की समुद्री स्थिति भारत के लिए परिवहन लागत और समय के लिहाज से उपयोगी हो सकती है। उन्होंने कहा कि यदि संगठित किसान, बेहतर बीज, स्थानीय खरीद केंद्र और तेल निकालने की सुविधाएं विकसित होती हैं, तो मोजांबिक भारत के लिए नियमित तिलहन आपूर्तिकर्ता बन सकता है।
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