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इसबगोल की खेती : किसानों के लिए बनी कमाई का जरिया, 130-140 रुपये किलो तक भाव, बेकरी से विदेशों तक बढ़ी मांग

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 01 Oct 2026 06:17 PM IST
सार

इसबगोल की व्यावसायिक खेती मुख्य रूप से भारत में ही होती है। इसकी शुरुआत गुजरात से हुई थी, लेकिन अब देश के कुल उत्पादन का 80-85 फीसदी राजस्थान में होता है। मध्य प्रदेश में भी इसकी खेती होती है। वर्तमान में देश में इसबगोल का सालाना उत्पादन करीब 2.62 लाख टन है।

इसबगोल
इसबगोल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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कुछ साल पहले तक इसबगोल का इस्तेमाल मुख्य रूप से कब्ज और पेट की समस्याओं में किया जाता था। अब इसका इस्तेमाल हेल्थ और वेलनेस उत्पादों, बेकरी और पालतू जानवरों के भोजन में भी तेजी से बढ़ रहा है। गुजरात की सिधपुर सत-इसबगोल फैक्टरी के प्रबंध निदेशक नीरज वाधवा के मुताबिक, पिछले एक दशक में इसबगोल के इस्तेमाल का दायरा काफी बढ़ा है।

उन्होंने बिजनेस लाइन को बताया कि इसबगोल एक डाइटरी फाइबर है। अलग-अलग अध्ययनों में इसके सेवन से कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में संभावित लाभ बताए गए हैं। इसी वजह से वजन घटाने और पेट की सेहत से जुड़े उत्पादों में भी इसकी मांग बढ़ी है।

बेकरी और पेट फूड में बढ़ी मांग
वाधवा के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में बेकरी उद्योग में इसबगोल का इस्तेमाल काफी बढ़ा है। अब पालतू जानवरों के भोजन में भी इसकी मांग बढ़ रही है। इसबगोल में घुलनशील फाइबर की मात्रा अधिक होती है, इसलिए इसे डाइटरी सप्लीमेंट और फाइबर के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इसबगोल का घरेलू और निर्यात बाजार भी बढ़ा है। कंपनी के उत्पादन का 90-95 फीसदी हिस्सा अमेरिका, यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया को थोक में निर्यात होता है। अमेरिका और यूरोप इसके बड़े बाजार हैं।

80-85 फीसदी उत्पादन राजस्थान में
इसबगोल की व्यावसायिक खेती मुख्य रूप से भारत में ही होती है। इसकी शुरुआत गुजरात से हुई थी, लेकिन अब देश के कुल उत्पादन का 80-85 फीसदी राजस्थान में होता है। मध्य प्रदेश में भी इसकी खेती होती है। वर्तमान में देश में इसबगोल का सालाना उत्पादन करीब 2.62 लाख टन है। इसके बीज से प्रसंस्करण के जरिए इसबगोल की भूसी (हस्क) तैयार की जाती है। कंपनियां मंडियों से बीज खरीदने के साथ कई जगह किसानों से सीधे भी खरीद करती हैं।

गुजरात से राजस्थान क्यों पहुंची खेती?
इसबगोल की खेती के राजस्थान में बढ़ने की बड़ी वजह वहां की मिट्टी और मौसम को बताया जाता है। गुजरात के राजस्थान से सटे बनासकांठा जिले में भी इसकी खेती होती है। कंपनी के मुताबिक, गुजरात के कई किसानों ने अनार, अरंडी, सरसों और आलू जैसी दूसरी फसलों का रुख किया है। वहीं राजस्थान में कम पानी वाले इलाकों में भी इसबगोल की खेती संभव है। यही वजह है कि इसका रकबा राजस्थान में बढ़ा है।

ठंड में बुवाई, गर्मी में कटाई
इसबगोल को ठंडे मौसम की जरूरत होती है, जबकि पकने के समय गर्म मौसम फायदेमंद रहता है। आमतौर पर इसकी बुवाई दिसंबर में और कटाई मार्च-अप्रैल में होती है। गुजरात और राजस्थान का मौसम इसकी खेती के लिए अनुकूल माना जाता है। किसानों के लिए इसबगोल और जीरा एक-दूसरे के विकल्प भी हैं। बाजार भाव के आधार पर किसान दोनों फसलों के रकबे में बदलाव करते हैं। कंपनी के अनुसार, फिलहाल उत्पादन मांग से अधिक है, लेकिन आने वाले समय में स्थिति बदल सकती है।

किसानों को अब 130-140 रुपये किलो तक भाव
कंपनी के प्रबंध निदेशक के मुताबिक, पिछले करीब एक दशक में इसबगोल के दाम किसानों के लिए 75-80 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 130-140 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। उन्होंने कहा कि अगर कीमत 120 रुपये प्रति किलो से नीचे जाती है तो किसान दूसरी फसल की ओर रुख कर सकते हैं। सिधपुर सत-इसबगोल का उत्पादन भी हर साल करीब 6-7 फीसदी बढ़ रहा है। कंपनी सिधपुर में नया प्लांट लगा रही है। इससे उसकी मौजूदा करीब 3,000 टन सालाना क्षमता दोगुनी होने की उम्मीद है।

भूसी के बाद बचा बीज पशु आहार में
इसबगोल से भूसी निकालने के बाद बचा बीज भी उपयोगी होता है। इसमें प्रोटीन की मात्रा होने के कारण इसका इस्तेमाल पशु आहार में किया जाता है। वाधवा के मुताबिक, बनास डेयरी जैसी बड़ी डेयरियां भी बचे हुए बीज से पशु आहार तैयार करती हैं।
 
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