गेहूं और चावल के भंडारण के दौरान लगने वाले कीटों से अनाज को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) ने नई तकनीकों पर शोध के लिए समझौता किया है। दोनों संस्थानों ने 30 सितंबर को समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। इस परियोजना को उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (DFPD) का सहयोग मिला है।
दो साल चलेगा पहला चरण
परियोजना का पहला चरण दो साल का होगा। इसे ICAR के केंद्रीय कटाई उपरांत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (CIPHET), लुधियाना की ओर से संचालित किया जाएगा। इसमें मौजूदा रासायनिक धुआं उपचार (फ्यूमिगेशन) के विकल्प के तौर पर नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और CO₂-फॉस्फीन के मिश्रण की प्रभावशीलता जांची जाएगी।
भारत में लंबे समय से भंडारित अनाज को कीटों से बचाने के लिए एल्युमिनियम फॉस्फाइड और मैलाथियान जैसे रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है। इनके लगातार इस्तेमाल से कई राज्यों में कीटों में प्रतिरोध बढ़ा है। कुछ प्रमुख राज्यों में कीट प्रतिरोध की दर 72 से 100 फीसदी तक पहुंचने का उल्लेख परियोजना में किया गया है। इससे बार-बार फ्यूमिगेशन की जरूरत पड़ती है और भंडारण की लागत भी बढ़ती है। रासायनिक फ्यूमिगेशन से कर्मचारियों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी जोखिम रहता है।
तीन तरह के परीक्षण होंगे
पहले चरण में तीन प्रमुख परीक्षण किए जाएंगे-
धातु के साइलो में रखे गेहूं के लिए 99 फीसदी से अधिक शुद्धता वाली नाइट्रोजन गैस से फ्यूमिगेशन।
FCI और CWC के गोदामों में बोरियों में रखे गेहूं और चावल के लिए CO₂ और फॉस्फीन गैस के संयुक्त इस्तेमाल का परीक्षण।
हर्मेटिक कवर यानी हवा को लगभग बंद रखने वाले विशेष कवर में रखे गेहूं और चावल के लिए CO₂ फ्यूमिगेशन का परीक्षण।
दूसरे चरण में अलग-अलग क्षेत्रों में होगा परीक्षण
पहले चरण के बाद परियोजना का दूसरा चरण एक साल का होगा। इसमें देश के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बड़े स्तर पर परीक्षण किए जाएंगे। इसके आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की जाएगी।
परियोजना का उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जो वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित होने के साथ बड़े स्तर पर इस्तेमाल की जा सके। इससे कीटों में बढ़ते रासायनिक प्रतिरोध, भंडारण कर्मचारियों के रसायनों के संपर्क, पर्यावरणीय जोखिम और अनाज में फ्यूमिगेंट के अवशेष जैसी चिंताओं को कम करने में मदद मिल सकती है।
MoU पर ICAR-CIPHET के निदेशक डॉ. नचिकेत कोटवालीवाले और FCI के कार्यकारी निदेशक (गुणवत्ता नियंत्रण) डॉ. ए.के. सिन्हा ने हस्ताक्षर किए। इस दौरान ICAR के महानिदेशक एवं DARE के सचिव डॉ. एम.एल. जाट समेत दोनों संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी और वैज्ञानिक मौजूद रहे।
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