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Mushkbudji Rice: सेब के बाग बढ़े, धान के खेत घटे... कश्मीर के खुशबूदार चावल पर संकट

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 24 Oct 2026 11:50 AM IST
सार

कश्मीर में नौ साल में धान की खेती का रकबा घटा, जबकि सेब की बागवानी करीब 60% बढ़ी। जानें कैसे खेती में बदलाव और चावल की बढ़ती बाहरी आपूर्ति मुश्कबुदजी जैसी पारंपरिक किस्मों के लिए चुनौती बन रही है।

कश्मीर के धान
कश्मीर के धान - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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कश्मीर की पहचान सिर्फ केसर और सेब के बागों से नहीं, बल्कि धान के लहलहाते खेतों और अपनी खास खुशबू के लिए मशहूर मुश्कबुदजी चावल से भी रही है। लेकिन अब घाटी में खेती की तस्वीर बदल रही है। बेहतर कमाई की उम्मीद में किसान धान की खेती के बजाय सेब और दूसरी बागवानी फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे स्थानीय धान उत्पादन और कश्मीर की पारंपरिक चावल किस्मों के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ रही है।

कृषि उत्पादन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले नौ वर्षों में जम्मू-कश्मीर में धान की खेती का रकबा करीब 3.045 लाख हेक्टेयर से घटकर 2.588 लाख हेक्टेयर रह गया है। वहीं, पिछले दो दशकों में सेब की खेती का क्षेत्रफल करीब 60 प्रतिशत बढ़कर 1.73 लाख हेक्टेयर हो गया है।

धान की खेती का रकबा घटने के साथ दूसरे राज्यों से जम्मू-कश्मीर में चावल की आपूर्ति भी बढ़ी है। वर्ष 2022-23 में दूसरे राज्यों से 3.74 लाख टन चावल आया था, जो 2024-25 में बढ़कर 4.86 लाख टन हो गया। यानी दो वर्षों में आपूर्ति में करीब 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

बेहतर कमाई के लिए बदल रहे खेती का तरीका
कृषि विशेषज्ञ मंदीप सिंह के अनुसार, सेब की बागवानी किसानों की आय का एक अहम जरिया है। बाजार में मांग और अच्छी कमाई की संभावना किसानों को इसकी ओर आकर्षित करती है। इसके मुकाबले धान की खेती में अधिक श्रम, पानी, लागत और मौसम से जुड़ी चुनौतियां हैं। यही वजह है कि किसान अपनी जरूरतों और बाजार की संभावनाओं को देखते हुए खेती के तरीके बदल रहे हैं।

हालांकि, बागवानी से किसानों को बेहतर आय के अवसर मिल सकते हैं, लेकिन धान की खेती का रकबा लगातार घटने से स्थानीय खाद्यान्न उत्पादन बनाए रखना भी चुनौती बन रहा है। दूसरे राज्यों से चावल की बढ़ती आपूर्ति इसी बदलाव की ओर संकेत करती है।

मुश्कबुदजी चावल की खुशबू और पहचान बचाना जरूरी
कश्मीर का पारंपरिक सुगंधित चावल मुश्कबुदजी अपने खास स्वाद और खुशबू के लिए जाना जाता है। इसे घाटी की कृषि विरासत का अहम हिस्सा माना जाता है। लेकिन धान की खेती कम होने से ऐसी पारंपरिक किस्मों को बचाए रखने की जरूरत और बढ़ गई है।

इस किस्म को बढ़ावा देने के लिए किसानों को उचित दाम, अच्छी गुणवत्ता वाले बीज और बाजार उपलब्ध कराना जरूरी है। इससे किसानों को पारंपरिक धान की खेती जारी रखने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है और स्थानीय चावल की पहचान भी बनी रह सकती है।

दूसरी पारंपरिक किस्मों को भी बचाने की जरूरत
मुश्कबुदजी के अलावा कश्मीर में कामद भी एक प्रसिद्ध सुगंधित पारंपरिक चावल की किस्म है। इसके स्वाद और पकने के बाद की बनावट के कारण इसे खास अवसरों और पारंपरिक भोज में शामिल किया जाता है। इसके साथ जाग, नून बियोल और काव क्रीड जैसी किस्मों का भी घाटी की पारंपरिक खेती में महत्व बताया जाता है।

इन किस्मों को संरक्षित करने के लिए बीजों की उपलब्धता, किसानों को उचित मूल्य और बाजार से जोड़ने जैसे कदम जरूरी हैं। इससे कश्मीर की पारंपरिक धान किस्मों को बचाने के साथ स्थानीय खाद्यान्न उत्पादन को बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है।
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