फिल्मों में अपने दमदार अभिनय के दम पर पहचान बनाने वाले नाना पाटेकार का गुरूवार सुबह 75 साल की उम्र में निधन हो गया। बॉलीबुड के अलावा नाना पाटेकर ने सामाजिक कार्यों के मोर्चे फर भी अपनी एक अलग और शांत पहचान बनाई। बीते सालों में लाखों किसानों को नाना पाटेकर ने सहारा दिया है।
कहानी साल 2015 में शुरू हुई थी, जब पाटेकर ने मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ पुणे में नाम फाउंडेशन की शुरुआती की। यह संस्था खासतौर से सूखे और कर्ज की मार झेल रहे किसानों की मदद करने के लिए जानी जाती है। किसानों की मदद का यह सफर उस 1.5 करोड़ की गाड़ी से शुरू होता है, जिसे नाना पाटेकर ने खरीदने का मन बनाया, लेकिन उसी पैसे का इस्तेमाल पाटनेकर ने महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्रों में आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों की सीधी मदद के लिए किया। कुछ समय बाद किसानों की मदद के इस काम को बड़े स्तर पर ले जाने के लिए इसे एक एनजीओ के रूप में पंजीकृत कर लिया गया।
77 लाख से ज्यादा किसानों तक पहुंचा लाभ
आंकड़ों के अनुसार, अपनी शुरुआत से लेकर अब तक नाम फाउंडेशन ने 77.17 लाख किसानों को सहारा दिया है। इसके साथ ही 50,908 परिवारों को आपदा के समय राहत, 102 शहीद जवानों के परिवारों को आर्थिक मदद और 4,957 विधवाओं को मदद पहुंचाई गई है। शुरुआत में संस्था ने हजारों विधवाओं और पीड़ित परिवारों को 15,000 से 25,000 रुपये के चेक दिए। केवल नकद मदद ही नहीं, बल्कि महिलाओं को रोजगार देने के लिए सिलाई मशीन, आटा चक्की और बकरियां भी बांटी गईं। इसके अलावा संस्था द्वारा किसानों के बच्चों की शिक्षा, भोजन और रहने की व्यवस्था के साथ-साथ गरीब परिवारों में शादियां भी कराई गईं।
सूखाग्रस्त गांवों को गोद लेकर उन्हें बनाया आत्मनिर्भर
किसानों की स्थिति को जड़ से सुधारने के लिए गांवों को गोद लेना नाम फाउंडेशन की एक अहम रणनीति रही है। संस्था ने छत्रपति संभाजीनगर जिले की वैजापुर तालुका के धोंडलगांव और वर्धा जिले के आमला गांव को आधिकारिक तौर पर गोद लिया था। इसका मुख्य लक्ष्य जल संरक्षण, खेती के तरीकों और स्थानीय रोजगार में सुधार करके इन गांवों को पूरी तरह से आत्मनिर्भर और टैंकर-मुक्त बनाना था।
महिलाओं को रोजगार देने से बच्चों की पढ़ाई तक पर फोकस
गांवों को गोद लेने का फैसला पानी की कमी, लोगों के काम करने की इच्छा और शराब समेत पेड़ काटने पर रोक जैसे नियमों के आधार पर किया जाता था। इन गांवों में संस्था ने किसानों के बच्चों की पढ़ाई, हुनर निखारने और सैकड़ों युवाओं व महिलाओं को रोजगार देने की योजनाएं चलाईं। फाउंडेशन ने पौधारोपण, किसानों के लिए खेती की ट्रेनिंग, सामूहिक खेती, नदियों की सफाई और प्रभावित परिवारों के लिए पक्के घर बनाने जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम भी चलाए। पाटेकर अक्सर बिना किसी प्रचार के अपनी पुरस्कार राशि और फिल्मों से होने वाली कमाई को सूखा राहत और किसानों के समर्थन में दान कर देते थे।
महाराष्ट्र के बाहर भी बढ़ाया मदद का हाथ
महाराष्ट्र के किसानों के अलावा, नाना पाटेकर ने दूसरे राज्यों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में भी मदद की। उन्होंने बिहार जैसे राज्यों में बाढ़ राहत कार्यों में अपना योगदान दिया। जम्मू-कश्मीर के राजौरी और पुंछ जिलों में सीमा पार से होने वाली गोलाबारी से प्रभावित परिवारों को उन्होंने 42 लाख रुपये की राहत राशि दी और कई स्कूलों को गोद लिया। वहां उन्होंने सेना के साथ मिलकर लोगों के कौशल विकास के लिए भी काम किया। राजनीतिक नेताओं और नागरिक समाज ने उनके इस बड़े काम की हमेशा सराहना की है।