एक तरफ केंद्र सरकार किसानों की मांग और पर्यावरण से जुड़े खतरों को ध्यान में रखकर एचटीबीटी कपास को परख रही है, दूसरी तरफ देश में बिना मंजूरी वाली कपास की यह किस्म बड़े पैमाने पर उगाई जा रही है
एक ताजा अध्ययन के अनुसार, एचटीबीटी कपास का दायरा 65 से 72 लाख एकड़ में पहुंच चुका है, यह देश के कुल कपास रकबे का एक तिहाई है। एचटीबीटी कपास की अनधिकृत खेती ने बीज से जुड़े 1500 करोड़ रुपये के काले बाजार को जन्म दिया है। बता दें कि एचटीबीटी कपास एक जीएम फसल से , जिसमें कीटों से लड़ने और कुछ खास खरपतवार नाशकों को सहने की क्षमता होती है।
बीते सालों में भारत के कपास उत्पादन में लगातार गिरावट देखने को मिली है, जिसके पीछे कीटों का हमला और खरपतवा्र प्रमुख कारण बताए जाते हैं। कई जानकार इस तकनीक को कपास की खेती से जुड़ी चुनौतियों का समाधान बताते हैं। हालांकि सरकार ने अभी तक इसकी खेती को कानूनी मंजूरी नहीं दी है।
किसानों को नुकसान का खतरा, सरकार से मंजूरी की मांग
फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया से जुड़े उद्योग निकाय ने सरकार से एचटीबीटी कपास के उत्पादन और बिक्री को कानूनी मान्यता देने की मांग की है। उनका तर्क है कि अवैध किस्मों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से कपास उत्पादन पर असर पड़ रहा है, जो लंबे समय में किसानों को नुकसान पहुंचा सकता है।
खरीफ 2025-26 के दौरान 16 जिलों में हुआ अध्य्यन, जीएम गुण मिले
यह अध्ययन साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर द्वारा फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया और नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सहयोग से किया गया है। महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के 16 जिलों में हुए इस अध्ययन में पाया गया कि खरीफ सीजन 2025-26 के दौरान 24 से 30 प्रतिशत कपास क्षेत्र में अवैध एचटीबीटी कपास उगाई गई। FSII के अध्यक्ष अजय राणा ने बताया कि खेतों से लिए गए नमूनों की जांच में 98.2 प्रतिशत बीजों में कम से कम एक जीएम गुण मिला। वहीं, 41.9 प्रतिशत बीजों में Vip3A सहित चार ट्रांसजीन पाए गए, जो फसल को कीटों से बचाने वाला एक ऐसा जीन है जिसे भारत में उपयोग की मंजूरी नहीं मिली है।
मजदूरी की बढ़ती लागत से काले बाजार की ओर रुख कर रहे किसान
अध्ययन के मुताबिक, मजदूर न मिलने और खेतों से खरपतवार निकालने की बढ़ती लागत के कारण किसान पंजीकृत दुकानों के बजाय काले बाजार से टेक्नोलॉजी फीस के नाम पर ज्यादा पैसे देकर ये बीज खरीद रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि ग्लाइफोसेट नाम की दवा के छिड़काव से खरपतवार नियंत्रण में प्रति एकड़ केवल 750 से 850 रुपये का खर्च आता है, जबकि मजदूरों से यह काम कराने पर 12,000 से 15,000 रुपये लग जाते हैं। यही कारण है कि एक साल में ग्लाइफोसेट की खपत 26 प्रतिशत बढ़कर 27,721 किलोलीटर (2024-25) से 35,642 किलोलीटर (2025-26) हो गई है। यह दवा 20 लीटर के ड्रमों में गुप्त तरीके से बेची जा रही है। इसके उलट, सरकार द्वारा मंजूर बोलगार्ड-2 कपास के बीजों की बिक्री 2022 से 2026 के बीच 22.3 प्रतिशत तक गिर गई है।
महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों में सबसे अधिक अवैध बुवाई
अवैध एचटीबीटी कपास अपनाने में महाराष्ट्र सबसे आगे है। यहां औसतन 58 प्रतिशत खेतों में इसकी बुवाई हुई है, जबकि यवतमाल जिले में यह आंकड़ा 76 प्रतिशत तक पहुंच गया है। तेलंगाना में यह 66 प्रतिशत (महबूबाबाद में 82 प्रतिशत) और आंध्र प्रदेश में 49 प्रतिशत (कुरनूल में 75 प्रतिशत) दर्ज किया गया। हालांकि, राजस्थान में इसकी खेती ना के बराबर है, लेकिन वहां 'पिंक बॉलवर्म' (गुलाबी सुंडी) से निपटने के लिए अवैध 'बीजी-3' बीजों की मांग बढ़ रही है।
कपास की खेती, अब गैर पारंपरिक राज्यों की ओर खिसक रही है
पारंपरिक कपास उत्पादक क्षेत्रों, जैसे पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में कपास का उत्पादन लगातार घट रहा है और यह खेती अब पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों की ओर खिसक रही है। कपड़ा मंत्रालय के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर कपास का उत्पादन 2020-21 के 352.48 लाख गांठ से गिरकर 2025-26 में 290.91 लाख गांठ रह गया है।
एक साल में हरियाणा-पंजाब के रकबे में हजारों हेक्टेयर की गिरावट
कॉटन एडवाइजरी बोर्ड के अप्रैल 2026 के आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में हरियाणा का कपास क्षेत्र 3.94 लाख हेक्टेयर और उत्पादन 9.75 लाख गांठ रहा, जबकि कृषि मंत्रालय के तीसरे अग्रिम अनुमान में यह उत्पादन 8.8 लाख गांठ बताया गया है। कृषि मंत्रालय की बुवाई रिपोर्ट के अनुसार, एक साल के भीतर हरियाणा में कपास का रकबा लगभग 90 हजार हेक्टेयर और पंजाब में 43 हजार हेक्टेयर घट गया है।
रकबा बढ़ाने के लिए हरियाणा और केंद्र सरकार का प्लान
हरियाणा सरकार कपास के रकबे के बजाय पैदावार बढ़ाने पर फोकस कर रही है। इसके तहत सूक्ष्म पोषक तत्वों और एकीकृत कीट प्रबंधन के लिए किसानों को लागत का 50 प्रतिशत या 2,000 रुपये प्रति एकड़ की सब्सिडी देने की घोषणा की है। यह आर्थिक मदद अधिकतम दो एकड़ के लिए यानी प्रति किसान 4,000 रुपये तक दी जाएगी।
उत्पादन को बड़े स्तर पर बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने भी 5,659.22 करोड़ रुपये के बजट के साथ साल 2026-27 से 2030-31 तक के लिए कपास उत्पादकता मिशन शुरू किया है।
जानकारों का कहना है कि बिना मंजूरी वाले बीजों और ग्लाइफोसेट का जमकर इस्तेमाल खरपतवार और कीटों को इसे सहने के लिए मजबूत कर सकता है। दूसरी तरफ बीज गी गुणवत्ता और सुरक्षा के मोर्चे पर सवाले उठते हैं। इंडियन सोसाइटी फॉर कॉटन इम्प्रूवमेंट के अध्यक्ष सी.डी. माई ने कहा कि तकनीक का सही फायदा तभी मिल सकता है जब उसे कानूनी रूप से अपनाया जाए। रिपोर्ट में एक समय सीमा के भीतर नियामक ढांचे और नियमों में बदलाव करने की पुरजोर मांग की गई है।