जम्मू-कश्मीर के सेब किसानों के लिए सरकारी खरीद की सुविधा खत्म होने से अब फसल के भाव का जोखिम बढ़ गया है। मार्केट इंटरवेंशन स्कीम (एमआईएस) के तहत नेफेड (NAFED) की खरीद बंद होने के बाद किसान मुख्य रूप से आढ़तियों, कारोबारियों और थोक बाजारों पर निर्भर हैं। बाजार भाव गिरने पर खासकर छोटे और सीमांत किसानों को अपनी फसल कम कीमत पर बेचने का दबाव झेलना पड़ सकता है।
ऑल इंडिया किसान सभा, जम्मू-कश्मीर के अध्यक्ष गुलाम मोहम्मद भट ने बिजनेस लाइन से कहा कि यह योजना छोटे किसानों के लिए सुरक्षा कवच की तरह थी। उनके पास फसल बेचने के विकल्प सीमित होते हैं और बाजार भाव कमजोर होने पर उनकी सौदेबाजी की क्षमता भी कम रहती है।
2019 में शुरू हुई थी योजना
जम्मू-कश्मीर में सेब की खरीद के लिए मार्केट इंटरवेंशन स्कीम सितंबर 2019 में शुरू की गई थी। उस समय 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार के जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे से जुड़े फैसले के बाद घाटी में आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई थीं। सेब की फसल को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने में भी कई तरह की दिक्कतें सामने आई थीं।
योजना के तहत नेफेड जम्मू-कश्मीर के योजना एवं विपणन निदेशालय और जम्मू-कश्मीर हॉर्टिकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग एंड प्रोसेसिंग कॉरपोरेशन (JKHPMC) के सहयोग से तय केंद्रों पर किसानों से सीधे सेब खरीदता था। भुगतान किसानों के बैंक खातों में किया जाता था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 28 जनवरी 2020 तक नेफेड ने किसानों से 15,769 टन सेब खरीदे थे। इसकी कीमत करीब 70.45 करोड़ रुपये थी।
12 लाख टन तक खरीद की थी मंजूरी
योजना को 2020-21 में भी आगे बढ़ाया गया था। उस समय नेफेड को 12 लाख टन तक सेब खरीदने की अनुमति दी गई थी। इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से 2,500 करोड़ रुपये की गारंटी भी दी गई थी। खरीद में होने वाले नुकसान को केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के बीच 50:50 के अनुपात में बांटने का प्रावधान था।
बिचौलियों पर निर्भरता कम हुई थी
सेब किसानों के लिए योजना का फायदा केवल सरकारी खरीद तक सीमित नहीं था। इससे उन्हें निजी कारोबारियों के अलावा फसल बेचने का एक और विकल्प मिलता था। फल मंडी शोपियां के अध्यक्ष मोहम्मद अशरफ वानी ने कहा कि सीधे खरीद की व्यवस्था से किसानों को बिचौलियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिली थी। उन्होंने कहा कि नेफेड के जरिए खरीद होने पर किसानों को सीधे भुगतान मिलता था और कारोबारियों द्वारा भुगतान रोकने या रकम में कटौती की आशंका कम रहती थी।
अब योजना के हटने के बाद किसानों के पास सेब बेचने के लिए निजी कारोबारी और थोक मंडियां ही प्रमुख विकल्प हैं। ऐसे में किसान को मिलने वाला भाव बाजार की मांग, सेब की गुणवत्ता, ग्रेड और उस समय बाजार में पहुंचने वाली फसल की मात्रा पर अधिक निर्भर हो गया है।
छोटे किसानों पर ज्यादा असर
किसान प्रतिनिधियों का कहना है कि बाजार भाव कमजोर होने पर छोटे उत्पादकों की स्थिति ज्यादा मुश्किल हो सकती है। गुलाम मोहम्मद भट ने आरोप लगाया कि खासकर कम ग्रेड वाले सेब के मामले में किसानों और बाहरी थोक बाजारों में मिलने वाले भाव के बीच बड़ा अंतर हो सकता है। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर किसानों से सी-ग्रेड सेब कम कीमत पर खरीदा जाता है और दूसरे राज्यों की थोक मंडियों में उसे अधिक कीमत पर बेचा जाता है। हालांकि, यह किसान प्रतिनिधि का आरोप है।
करीब 20 लाख टन सालाना सेब उत्पादन
जम्मू-कश्मीर में सेब उद्योग का बड़ा आर्थिक महत्व है। यहां हर साल करीब 20 लाख टन सेब का उत्पादन होता है और लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है। अब किसान संगठनों और उत्पादकों के सामने सवाल यह है कि बाजार में कीमतें तेजी से गिरने की स्थिति में किसानों को राहत देने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था होगी या नहीं। किसान प्रतिनिधि ऐसी व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, जिससे कमजोर बाजार के दौरान उन्हें फसल का उचित मूल्य मिल सके।
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