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भारत के बासमती पर यूरोप में बड़ा पेच : GI सुरक्षा का अब भी इंतजार, ‘जेनेरिक’ दर्जे की आशंका

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Wed, 30 Sep 2026 11:41 AM IST
सार

  • भारत ने बासमती के लिए EU में जुलाई 2018 में PGI आवेदन किया था।
  • करीब आठ साल बाद भी आवेदन पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
  • पाकिस्तान ने अप्रैल 2024 में EU में बासमती PGI के लिए आवेदन किया।
  • EU भारत और पाकिस्तान से बासमती के लिए संयुक्त GI आवेदन चाहता है।

बासमती चावल
बासमती चावल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारतीय बासमती चावल को यूरोपीय संघ (EU) में प्रोटेक्टेड जियोग्राफिकल इंडिकेशन (PGI) का दर्जा मिलने का मामला अब भी अटका हुआ है। व्यापार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यूरोप में कुछ विशेषज्ञ बासमती को एक खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े उत्पाद के बजाय सामान्य (जेनेरिक) चावल की किस्म के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

बासमती को PGI दर्जा मिलने से भारत को इस नाम का विशेष भौगोलिक और व्यावसायिक संरक्षण मिल सकता है। इससे यह तय करना आसान होगा कि किन क्षेत्रों में पैदा होने वाले चावल को बासमती नाम से बेचा जा सकता है और उत्पाद को प्रीमियम कीमत भी मिल सकती है।

बासमती की बिक्री और उत्पादन को लेकर सवाल
जर्मन मीडिया संस्थान DW की एक रिपोर्ट में फ्रांस की कृषि अनुसंधान संस्था CIRAD से जुड़ी डेल्फिन मैरी-विवियन ने कहा कि बासमती के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में खेती का रकबा और उत्पादन, बाजार में बिकने वाले सुगंधित चावल की मात्रा से मेल नहीं खाता।

कुछ यूरोपीय विशेषज्ञों का दावा है कि बाजार में ‘फ्रैगरेंट राइस’ के नाम से बिकने वाले चावल की मात्रा बासमती के मूल क्षेत्रों के उत्पादन से करीब 10 गुना है। हालांकि, व्यापार सूत्रों के मुताबिक इस दावे के समर्थन में कोई ऐसा प्रमाण या प्रयोगशाला जांच सामने नहीं आई है, जिससे यह साबित हो कि बाजार में बासमती नाम से बिकने वाले 90 फीसदी चावल वास्तव में गैर-बासमती हैं।

PGI दर्जा क्यों महत्वपूर्ण है?
PGI यानी Protected Geographical Indication किसी ऐसे उत्पाद को भौगोलिक पहचान और संरक्षण देता है, जिसकी खासियत किसी विशेष क्षेत्र से जुड़ी होती है। बासमती को PGI मिलने पर भारत को यूरोपीय बाजार में इस नाम के इस्तेमाल को लेकर अधिक स्पष्ट अधिकार मिल सकते हैं। इससे दूसरे क्षेत्रों के सामान्य लंबे दाने वाले सुगंधित चावल को बासमती के नाम से बेचने पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है।

भारत ने 2018 में किया था आवेदन
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने बासमती के लिए EU में जुलाई 2018 में PGI आवेदन किया था। लेकिन अब तक इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इसी बीच पाकिस्तान ने अप्रैल 2024 में PGI के लिए आवेदन किया।

व्यापार सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान के आवेदन से जुड़े तीन प्रमुख मुद्दे हैं। पहला, पाकिस्तान ने अपने आवेदन में भारत के कुछ बासमती उत्पादक क्षेत्रों को भी अपने दावे में शामिल किया है। दूसरा, उसने बासमती को भारत और पाकिस्तान का साझा उत्पाद बताया है। तीसरा, पाकिस्तान को अपने देश में बासमती के लिए घरेलू GI पंजीकरण 2021 में मिला।

भारत-पाकिस्तान का संयुक्त आवेदन चाहता है EU
यूरोपीय संघ की ओर से भारत और पाकिस्तान को बासमती के लिए संयुक्त GI आवेदन देने का सुझाव दिया गया है। यूरोपीय पक्ष का तर्क है कि दोनों देशों के बीच मतभेद के कारण बासमती की भौगोलिक पहचान को परिभाषित करने और उसके संरक्षण की साझा व्यवस्था बनाना मुश्किल हो रहा है।

हालांकि, व्यापार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और पाकिस्तान का संयुक्त आवेदन स्वीकार करने से भारत के उन क्षेत्रों पर भी विवाद खड़ा हो सकता है, जिन्हें पाकिस्तान अपने बासमती क्षेत्र के हिस्से के रूप में दावा करता है।

लंबे समय तक मामला अटकने से बढ़ी चिंता
भारत के आवेदन के करीब आठ साल बाद भी PGI का मामला लंबित है। इस दौरान बासमती नाम के इस्तेमाल को लेकर नियंत्रण और निगरानी की कमी पर सवाल उठते रहे हैं। व्यापार सूत्रों का कहना है कि अगर अलग-अलग क्षेत्रों में पैदा होने वाले चावल को लगातार बासमती नाम से बेचा जाता रहा तो यूरोपीय उपभोक्ताओं के बीच धीरे-धीरे ‘बासमती’ की पहचान किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी किस्म के बजाय लंबे दाने वाले सुगंधित चावल की सामान्य श्रेणी के रूप में बन सकती है।

फ्रांस के उत्पादों से जुड़ा है GI विवाद
बासमती का मुद्दा भारत-ईयू के व्यापक व्यापार संबंधों से भी जुड़ा है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर जनवरी 2026 में सहमति बनी थी, लेकिन GI उत्पादों के लिए अलग समझौते पर बातचीत जारी है।

यूरोपीय संघ अपने पारंपरिक उत्पादों, खासकर फ्रांस के वाइन और स्पिरिट्स को भारतीय बाजार में भौगोलिक पहचान का मजबूत संरक्षण दिलाना चाहता है। भारत भी अपने बासमती जैसे GI उत्पादों के लिए इसी तरह का संरक्षण चाहता है।

वाइन और स्पिरिट्स पर भी शुल्क में बदलाव
भारत-ईयू FTA के तहत यूरोपीय वाइन और स्पिरिट्स पर भारत में आयात शुल्क कम करने का प्रावधान है। प्रीमियम वाइन पर शुल्क 150 फीसदी से घटकर 20 फीसदी और मध्यम श्रेणी की वाइन पर 30 फीसदी किया गया है। स्पिरिट्स पर शुल्क 150 फीसदी से घटकर 40 फीसदी होगा। व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे में GI समझौते की बातचीत भारत के लिए अपने बासमती समेत अन्य भौगोलिक पहचान वाले उत्पादों के संरक्षण का मुद्दा उठाने का अवसर भी है।

बासमती को ‘जेनेरिक’ बनाने की आशंका पर विवाद
‘Basmati Rice: The Natural History Geographical Indication’ के लेखक एस. चंद्रशेखरन के अनुसार, लंबे समय तक बासमती नाम के अनियंत्रित इस्तेमाल से यूरोप में उपभोक्ताओं की इस चावल की पहचान बदल सकती है। उन्होंने दावा किया कि कुछ लोग इसी स्थिति को आधार बनाकर बासमती के PGI मामले को एक अलग नजरिए से पेश कर रहे हैं। उनके मुताबिक, बासमती का मामला भारत-ईयू के बीच GI उत्पादों को लेकर होने वाली बातचीत में महत्वपूर्ण है।

हालांकि, EU में बासमती के PGI आवेदन पर अंतिम निर्णय अभी लंबित है। आगे की बातचीत में भारत और यूरोपीय संघ के बीच बासमती की भौगोलिक पहचान, उसके संरक्षण और भारत-पाकिस्तान के दावों से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनना महत्वपूर्ण होगा।
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